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Saturday, November 8, 2025

वेदना कुशासन के क्षण उत्सव का कैसे हो गया मन?

वेदना कुशासन के क्षण उत्सव का कैसे हो गया मन?: -वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली- जब आँखों में शर्म ही न रहे, तो क्या बचा? उत्तराखंड का रजत जयंती वर्ष चल रहा है, मगर यह उत्सव नहीं, वेदना का पर्व बन गया है। बाहर वालों द्वारा राज्य को रौंदा जा रहा है और भीतर से कुशासन उसे खोखला कर रहा है। फिर भी “लड़के लेंगे, भिड़के लेंगे

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