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Sunday, August 20, 2017

भारत समरसता सम्मान 2017












भारत समरसता मंच ने उत्तराखंड में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली विभूतियों को सम्मानित किया। उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित सम्मान समारोह में श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के कुलपति डा. यू.एस. रावत, लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत, शिक्षाविद् प्रोफेसर आलोक सकलानी, पर्यावरणविद् जगत सिंह जंगली, प्रसिद्ध भूगर्भशास्त्री डा. डी.पी डोभाल और सामाजिक उद्यमिता के क्षेत्र में योगदान देने के लिए रिटायर्ड लें कर्नल एम. के. हुसैन को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राचार्य डा. कमलेश भट्ट एवं प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी को भी सम्मानित किया जाना था, लेकिन खराब स्वास्थ्य की वजह से दोनों ही कार्यक्रम में नहीं आ पाए। इसके बाद आयोजकों ने दोनों ही विभूतियों को उनके घर पर ही सम्मान पहुंचाने का फैसला किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आर.एस.एस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने अपने भाषण के दौरान राष्ट्र निर्माण में अंबेडकर के योगदान, राष्ट्रवाद, जाति प्रथा खत्म करने, चीनी सामान का बहिष्कार करने, पाकिस्तान के मंसूबों को नाकाब करने, चरित्र निर्माण सहित कई मानव जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की।  
सम्मान समारोह का आयोजन भारत समरसता मंच ने शिवालिक इंस्टट्यूट आफ प्रोफेशनल स्टडीज के साथ मिलकर किया। स्वागत भाषण पूर्वाचंल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. पी.सी पतंजलि ने दिया। कार्यक्रम का संचालन दून विश्वविद्यालय के प्रबंधशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष एवं डीन प्रोफेसर एच.सी पुरोहित ने किया। कार्यक्रम में उत्तराखंड टेक्नीकल यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. पी. के गर्ग, शिवालिक संस्थान के वाइस चेयरमैन अजय कुमार सहित प्रदेश के कई अन्य लोग मौजूद थे।

Friday, August 18, 2017

उत्तराखंडी विभूतियां हुई सम्मानित






देहरादून- भारत समरसता मंच ने उत्तराखंड में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली विभूतियों को सम्मानित किया। उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित सम्मान समारोह में श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के कुलपति डा. यू.एस. रावत, लेखक एवं वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत, शिक्षाविद् प्रोफेसर आलोक सकलानी, पर्यावरणविद् जगत सिंह जंगली, प्रसिद्ध भूगर्भशास्त्री डा. डी.पी डोभाल और सामाजिक उद्यमिता के क्षेत्र में योगदान देने के लिए रिटायर्ड लें कर्नल एम. के. हुसैन को सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राचार्य डा. कमलेश भट्ट एवं प्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी को भी सम्मानित किया जाना था, लेकिन खराब स्वास्थ्य की वजह से दोनों ही कार्यक्रम में नहीं आ पाए। इसके बाद आयोजकों ने दोनों ही विभूतियों को उनके घर पर ही सम्मान पहुंचाने का फैसला किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आर.एस.एस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार ने अपने भाषण के दौरान राष्ट्र निर्माण में अंबेडकर के योगदान, राष्ट्रवाद, जाति प्रथा खत्म करने, चीनी सामान का बहिष्कार करने, पाकिस्तान के मंसूबों को नाकाब करने, चरित्र निर्माण सहित कई मानव जीवन के कई पहलुओं पर चर्चा की।  
सम्मान समारोह का आयोजन भारत समरसता मंच ने शिवालिक इंस्टट्यूट आफ प्रोफेशनल स्टडीज के साथ मिलकर किया। स्वागत भाषण पूर्वाचंल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डा. पी.सी पतंजलि ने दिया। कार्यक्रम का संचालन दून विश्वविद्यालय के प्रबंधशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष एवं डीन प्रोफेसर एच.सी पुरोहित ने किया। कार्यक्रम में उत्तराखंड टेक्नीकल यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. पी. के गर्ग, शिवालिक संस्थान के वाइस चेयरमैन अजय कुमार सहित प्रदेश के कई अन्य लोग मौजूद थे।

Wednesday, August 16, 2017

नरेंद्र सिंह नेगी को सामाजिक समरसता सम्मान से सम्मानित किया जाएगा।


नरेंद्र सिंह नेगी को सामाजिक समरसता सम्मान से सम्मानित किया जाएगा।

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सुप्रसिद्ध लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी को सामाजिक समरसता सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। भारत समरसता मंच एवं शिवालिक इंस्टिट्यूट ऑफ प्रोफेशनल स्टडीज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय गोष्ठी का आयोजन आगामी 18 अगस्त 2017 को उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के सभागार में होगा। उक्त गोष्ठी में सामाजिक समरसता में देवभूमि उत्तराखंड के योगदान पर विशेषज्ञ अपने विचार व्यक्त करेंगे। साथ ही इस क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को सम्मानित किया जाएगा। जिनमें लोककला के क्षेत्र में उत्तराखंड गौरव नरेंद्र सिंह नेगी, श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ यू.एस रावत, स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर आलोक सकलानी, वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत, वरिष्ठ भूवैज्ञानिक डॉ डी.पी. डोभाल, पर्यावरण संरक्षक जगत सिंह चौधरी –जंगली-, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ कमलेश भट्ट, सामाजिक उद्मिता के क्षेत्र में लें. कर्नल एम. के हुसैन आदि प्रमुख हैं।
कार्यक्रम के संयोजक एवं शिवालिक इंस्टिट्यूट के वाइस चेयरमैन अजय कुमार ने बताया कि उक्त गोष्ठी में सुप्रसिद्ध सामाजिक चिंतक एवं राष्ट्रीय मुस्लिम मंच विचारक इंद्रेश कुमार मुख्य वक्ता होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर पी. के. गर्ग करेंगे। समारोह में तमाम शिक्षाविद् शोध छात्र, विभिन्न संस्थानों के प्रमुख मौजूद होंगे।

Tuesday, August 15, 2017

15 अगस्त को देश आजाद हुआ मगर टिहरी रह गयी

15 अगस्त को देश आजाद हुआ मगर टिहरी रह गयी
-जयसिंह रावत
15 अगस्त 1947 को जब सारा देश आजादी का जश्न मना रहा था और देशवासी सारे जहां से अच्छे हिन्दोस्तां के खयालों में डूबे थे तो टिहरी राज्य में राजशाही की गुलामी का एक नया दौर शुरू हो रहा था। चूंकि अन्य देशी राज्यों के शासकों के साथ ही टिहरी नरेश की पैरामौंटसी (सार्वभौम सत्ता) भी ब्रिटिश सरकार के पास गिरवी थी इसलिये अंग्रेजी राज समाप्त होते ही टिहरी का राजा भी स्वयं को स्वतंत्र मान बैठा और लोकतंत्र के पक्ष में उठ रहे स्वरों को दबाने के लिये कमर कसने लगा। इससे पहले शोषत शासित प्रजा कभीकभार राजशाही की शिकायत सीधे पॉलिटिकल ऐजेंट या अंग्रेज हाकिमों से कर लेती थी लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद राजा महाराजाओं पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया था।
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जब 14 एवं 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया तो उसी दिन टिहरी में भी महाराजा द्वारा सैन्य परेड का आयोजन किया गया। शिव प्रसाद डबराल आदि इतिहासकारों के अनुसार इस अवसर पर घोषणा की गयी कि अब हमारे ऊपर अंग्रेजों का अधिपत्य नहीं रह गया और ब्रिटिश इंडिया के साथ ही टिहरी राज्य भी स्वतंत्र हो गया। इस अवसर पर महाराजा ने ढडकियों (आन्दोलनकारियों) को भी साफ तौर पर चेतावनी दे डाली कि उसके पास एक सुदृढ़ सेना है जो कि विद्रोहियों के दमन के लिये काफी है। चूंकि द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद बदले विश्व परिदृष्य में भारत की आजादी अवश्यंभावी लग रही थी और उसके बाद 20 फरबरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट रिचर्ड एटली ने पार्लियामेंट में उत्तरदायी भारतीयों के हाथों में देश की सत्ता सौंपने की घोषणा कर दी थी, इसलिये अन्य देशी राज्यों की तरह टिहरी राज्य के शासक को भी अंग्रेजों से मुक्ति मिलने की उम्मीद बढ़ने के साथ ही नयी परिस्थितियों में शासन की पकड़ मजबूत करने के लिये टिहरी नरेश ने ढंडकियों को कुचलने के लिये ’टिहरी गढ़वाल मैंटेनेंस आफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट (शांति रक्षा अधिनियम) पारित कर दिया था। देश की आजादी के साथ ही टिहरी नरेश ने राज्य के उत्पातियों के दमन के लिये इस अधिनियम का हथियार के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया।
दरअसल महाराजा को स्वतंत्र होने की गलतफहमी बेवजह नहीं थी। देश की अन्य लगभग 560 रियासतों की ही तरह टिहरी राज्य को भी आन्तरिक या बाहरी खतरे से सुरक्षा के लिये ब्रिटिश सरकार का संरक्षण प्राप्त था। सुरक्षा की गारंटी के बदले देशी रियासतों ने ब्रिटिश ’पैरामौंटसी’ स्वीकार कर रखी थी। ब्रिटिश राज समाप्त होने के साथ ही ब्रिटेन ने देशी राज्यों के साथ हुयी संधियों को समाप्त मान लिया था। इन संधियों के समाप्त होते ही देशी राज्य ब्रिटिश नियंत्रण सं मुक्त हो चुके थे। वैसे भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री कह गया था कि देशी राज्यों की सार्वभौम सत्ता किसी अन्य को नहीं सौंपी जायेगी। हालांकि नेहरू ने देशी राज्यों की स्वतंत्रता की थ्योरी को साफ तौर पर अस्वीकार करते हुये चेतावनी दे दी थी कि जो बाहरी देश इन राज्यों के साथ सीधा संबंध रखेगा उसे भारत सरकार शत्रुता मानेगी।
इसी दिन जब टिहरी प्रजामण्डल के अध्यक्ष परिपूर्णानन्द पैन्यूली अपनी जेल से फरारी के बाद नयी उम्मीदों को लेकर टिहरी की नयी राजधानी नरेन्द्रनगर पहुंचे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हिरासत में लेने के बाद पैन्यूली को जिस कोठरी में उन्हें रखा गया वह नर्क से बदतर थी। पैन्यूली स्वयं बताते हैं कि उस कोठरी की चाहर दीवारी पर मल-मूत्र से पुताई की गयी थी। यही नहीं सारे नगर का पखाना एकत्र कर इस कोठरी के फर्श पर जमा कर रखा था। ऐसी विभत्स और बदबूदार स्थिति में सांस लेना भी बहुत मुश्किल था। ऐसी स्थिति में भोजन करना भी बहुत कठिन था, इसलिये उन्होंने खाना-पीना बंद कर दिया। उन्होंने उस दौरान 21 दिन तक भूख हड़ताल की।
चारों ओर मल-मूत्र की बदबू और भूख हड़ताल के कारण पैन्यूली का स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था। चूंकि पैन्यूली अब एक साधारण आन्दोलनकारी न होकर प्रजामण्डल के प्रधान थे और टिहरी में चल रहे सत्याग्रह का उन्हें डिक्टेटर भी बनाया गया था इसलिये उनकी गिरफ्तारी के कारण रियासत के अंदर और बाहर काफी बवाल मचना स्वाभाविक ही था। यह समाचार लैंसडौन के ’कर्मभूमि’ समेत कई प्रमुख अखबारों में छप गया था। कुछ दिन बाद देशी राज्य लोक परिषद के महामंत्री जयनारायण व्यास को पता चला तो पैन्यूली से मिलने आये। तब तक पैन्यूली को उस नारकीय काल कोठरी से अस्पताल में लाया जा चुका था।
पैन्यूली की गिरफ्तारी  के बाद टिहरी के चीफ सेक्रेटरी ने देहरादून, लखनऊ, कानपुर, दिल्ली और गढ़वाल के जिला मजिस्ट्रेटों को भगोड़ा पैन्यूली की गिरफ्तारी की सूचना दे दी। चूंकि टिहरी शासन इससे पहले पैन्यूली की फारारी के बाद उनको गिरफ्तार कर उनका प्रत्यर्पण टिहरी राज्य को करने का अनुरोध 21 जनवरी 1947 को इन सभी जिलों के कलक्टरों से कर चुका था, इसलिये इन जिलों को नवीनतम् कार्यवाही की सूचना देनी जरूरी थी।  चीफ सेक्रटरी ने इस सूचना में अधिकारियों को सावधान करते हुये कहा गया कि पैन्यूली की जेल से फरारी के बाद वह प्रजामण्डल द्वारा प्रधान चुने गये हैं, इसलिये उनकी गिरफ्तारी की प्रतिक्रिया जनाक्रोश के रूप में उनके क्षेत्र में भी हो सकती है।
वास्तव में अगले ही दिन पैन्यूली की गिरफ्तारी के विरोध में टिहरी नगर में आम हड़ताल रही। दरबार की ओर से शांति प्रयास किये जाने के बजाय दमन का मार्ग अपनाया गया। राज्य में राजा तो 1946 में ही बदल गया था मगर दरबारी तो पुराने ही थे, जो कि पूर्व की भांति राजा को गलत राय ही देते थे। पुलिस ने प्रजामण्डल के कार्यकर्ताओं को पकड़ कर कारागार में डाल दिया। नगर के चारों ओर सेना का पहरा लगा दिया गया, जिससे सारा टिहरी नगर छावनी जैसा लगने लगा। इससे जनता का आक्रोश और भी अधिक भड़क गया। (डबराल: गढ़वाल का इतिहास भाग-3: 385 ) इसके बाद रियासत के विभन्न बाजार विरोध में बंद हो रहे थे। नागेन्द्र सकलानी, बंशीलाल पुडीर, दिनेश चन्द्र सकलानी, प्रेमलाल वैद्य, वीरेन्द्रदत्त सकलानी, मास्टर रामस्वरूप रतूड़ी आदि प्रमुख नेताओं को आन्दोलन भड़काने और शांति व्यवस्था भंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। प्रजामण्डल के संस्थापक सदस्य और अपने जमाने के मूर्धन्य पत्रकार श्यामचन्द सिंह नेगी अपने एक लेख (सितम्बर 1947: टिहरी सरकार समय की पुकार ) में लिखते हैं कि “प्रजामण्डल के प्रधान श्री परिपूर्णानन्द पैनोली प्रतिबन्ध की परवाह न कर 15 अगस्त को राज्य के अन्दर प्रवृष्ट हुये, यहीं से प्रजामण्डल का वर्तमान आन्दोलन छिड़ा।” वास्तव में टिहरी को राजशाही से आजाद करने वाली अहिंसक क्रांन्ति की शुरुआत पैन्यूली की गिरफ्तारी से शुरू हुयी। पैन्यूली के नेतृत्व में यह जन आन्दोलन सितम्बर 1947 से अपने चरम की ओर बढ़ने लगा ।
देवप्रयाग के भूमिगत आन्दोलनकारी मुरलीधर शास्त्री ने दिनांक 26 अगस्त 1947 को पत्र लिख कर पैन्यूली की गिरफ्तारी के बाद उत्पन्न स्थिति से अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के महामंत्री जयनारायण व्यास को अवगत कराते हुये कहा कि “अब पुनः पत्र लिखने का कारण कि टिहरी में पुनः दमन चक्र शुरू हो गया है। 16 ता. पं. परिपूर्णानंद, प्रधान केन्द्रीय प्रजामंडल के गिरफ्तार होने पर विरोध करने में राज्य की नौकरशाही ने दफा 144 ता. 17-8-47 से लेकर 29-8-47 तक लगा दी है और इसी में पं. प्रेमलाल वैद्य, पं. शंकर दत्त डोभाल वगैरह 8 व्यक्ति गिरफ्तार कर लिये गये हैं। इन पर पुलिस द्वारा मारपीट भी की गयी और पं. प्रेमलाल वैद्य के मुंह से खून की कै भी निकली। शंकर दत्त डोभाल का हाथ भी टूटा है और 19 ता0 से सबने भूख हड़ताल भी कर दी है।.....सुमन काण्ड की पुनरावृत्ति न हो जाय, ऐसा प्रतीत हो रहा है।” पैन्यूली की गिरफ्तारी के बाद भड़के जनाक्रोश को दबाने के लिये टिहरी के एडिशनल मजिस्ट्रेट ने नये सुरक्षा कानून के तहत टिहरी राज्य की कड़ाकोट, अकरी, डागर, डुंडसिर, बडियारगढ़, भरदार और सरजूला पट्टियों में 3 महीने के लिये धारा 144 लागू कर दी थी। ये पट्टियां प्रजामंडल से सहानुभूति रखने वाली मानी गयी थीं, जबकि कहीं कोई अशांति नहीं दिखाई दे रही थी। देवप्रयाग के मुरलीधर शास्त्री ने जयनारायण व्यास को 29 सितंबर 1947 को भी एक पत्र लिखा जिसमें पैन्यूली की गिरफ्तारी का विरोध करने वाले गिरफ्तार प्रजामण्डल कार्यकताओं पर लगे जुर्माने की वसूली के लिये प्रेमलाल वैद्य और शंकरदत्त डोभाल आदि की सम्पति कुर्क करने के आदेश जारी होने की भी शिकायत की। इस पत्र में शास्त्री ने जेल में बंद परिपूर्णानन्द द्वारा भूख हड़ताल किये जाने का भी उल्लेख करते हुये तत्काल हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया।
जानवरों जैसा भोजन, गंदगी और भूख हड़ताल से गिरते स्वास्थ्य तथा अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद सहित चारों ओर से पड़ रहे दबाव के आगे झुक कर दरबार ने अन्ततः पैन्यूली को सितम्बर 1947 में जेल से रिहा कर ही दिया। जेल से रिहाई के बाद परिपूर्णानन्द पैन्यूली ने टिहरी के जनसंघर्ष का संचालन एक बार फिर अपने हाथ में ले लिया और 15 जनवरी 1948 को प्रजामण्डल ने टिहरी की सत्ता अपने हाथ में ले ही ली। अगले दिन भारत सरकार ने टिहरी का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया और अन्ततः 1 अगस्त 1949 को टिहरी का भारत संघ में विलय हो ही गया। वास्तव में टिहरीवासियों का स्वतंत्रता दिवस ही यही है।

इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 (इंडिपेंडेंस ऑफ इंडिया एक्ट 1947) के तहत ब्रिटिश शासित क्षेत्र के भारतवासियों को स्वशासन सौंपे जाने के साथ ही देशी रियासतों पर भी ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता समाप्त हो गयी थी। क्योंकि ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से देशी राज्यों के साथ हुयी संधियों के तहत उनकी सुरक्षा की गारंटी और बदले में ब्रिटिश पैरामौंटसी (अधीनता) भी समाप्त हो चुकी थी। इसलिये टिहरी समेत अधिकांश नरेश स्वयं को सम्प्रभुता सम्पन्न अधिनायक मानने लगे थे। फिर भी ब्रिटिश संसद में वहां के एटार्नी जनरल ने स्पष्ट कर दिया था कि ब्रिटिश सम्राट/साम्राज्ञी इन रियासतों को पृथक अन्तराष्ट्रीय मान्यता देने को तैयार नहीं हैं। नेहरू भी साफ कह चुके थे कि अगर कोई देश इन रियासतों को मान्यता देगा तो उसे शत्रुतापूर्ण कार्यवाही माना जायेगा। सरदार पटेल के अनुरोध पर तत्कालीन गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने 25 जुलाइ 1947 को चैम्बर आफ प्रिंसेज के अधिवेशन में साफ कह दिया था कि देशी राज्यों को भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ मिल जाना चाहिये। गर्वनर जनरल ने साफ कह दिया था कि ऐसी भौगोलिक परिस्थितियां हैं जिनके चलते सुरक्षा और सुव्यवस्था की दृष्टि से देशी रियासतों को अपने से जुड़े ब्रिटिश शासित रहे प्रान्तों में मिलने के सिवा दूसरा विकल्प नहीं है। इसलिये 15 अगस्त 1947 तक हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर जैसे कुछ बड़े राज्यों को छोड़ कर टिहरी समेत 136 रियासतों ने इंट्रूमेंट ऑफ अक्सेशन (विलय पत्र) पर हस्ताक्षर कर दिये थे। भारत के गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल और देशी रियासतों से संबंधित विभाग के सचिव पी.वी. मेनन द्वारा बहुत ही चतुराई से तैयार इस विलयपत्र पर टिहरी के महाराजा मानवेन्द्र शाह ने 8 अगस्त को हस्ताक्षर कर दिये थे जिसे भारत के गर्वनर जनरल माउंटबेटन ने 16 अगस्त 1947 को स्वीकार किया। इससे पहले टिहरी के मुख्य सचिव पी.एल. सौंधी और भारत सरकार में देशी राज्यों के मामलों के सचिव पी.वी. मेनन ने 11 अगस्त 1947 को इस नयी शासन व्यवस्था के लिये संधि पर हस्ताक्षर कर दिये थे। इस अस्थाई नयी शासन व्यवस्था के तहत देशी राज्यों पर उनके शासकों का अधिपत्य तो था मगर संधि के तहत 18 ऐसे विषय थे जिन पर भारत अधिराज्य की विधायिका कानून बना सकती थी। इसका मतलब साफ था कि ये विषय भारत अधिराज्य के अधीन आ गये थे जिनमें रक्षा, विदेश मामले, संचार, मौद्रिक व्यवस्था, कस्टम, प्रत्यारोपण, सिंचाई, बिजली, आवश्यक वस्तुओं पर नियंत्रण, राष्ट्रीय राजमार्ग, नमक, रेलवे, डाक एवं तार, केन्द्रीय उत्पादकर, अफीम और मोटर वाहन आदि शामिल थे। इतने अधिकार गर्वनर जनरल के अधीन रह कर स्वशासन करने वाली भारत सरकार को देने के बावजूद टिहरी में सामन्तशाही निरंकुश शासन करती रही।
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Monday, August 14, 2017

562 Indian states were awaiting independence on August 1947

जयसिंह  रावत,  लेखक /पत्रकार 


अधूरा भारत ही आजाद हुआ था 15 अगस्त को

-जयसिंह रावत

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत 15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान कानूनी तौर पर दो स्वतंत्र राष्ट्र अवश्य बने मगर सही मायनों में सम्पूर्ण भारत फिर भी आजाद नहीं हुआ था। दरअसल यह केवल ब्रिटिश भारत का स्वतंत्रता दिवस था जिसके बाद भी देश में लगभग 562 देशी रियासतें मौजूद थीं जिनके अधिकांश शासकों को यह गलतफहमी हो गयी थी कि नयी व्यवस्था के तहत उनके सिर से ब्रिटिश साम्राज्ञी की पैरामौंट्सी (सार्वभौम सत्ता) हट गयी और अब वे फिर से निरंकुश शासक हो गये हैं। देखा जाय तो ब्रिटिश भारत की आजादी के साथ ही देशी राज्यों में भी राजशाही से स्वतंत्रता की मांग जोर पकड़ने लगी और अंतरिम सरकार में देशी राज्यों के मामलों के प्रभारी तथा गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल और इसी विभाग के 
Cover page of India Indepnendence Act 1947
सचिव वी.पी.मेनन की सूझबूझ, दृढ़ इच्छा शक्ति तथा दूरदृष्टि से 26 जनवरी 1950 को एक सम्प्रभुता सम्पन्न गणराज्य बनने से पहले ही सम्पूर्ण भारत एक ही शासन व्यवस्था के तहत एकता के सूत्र में बंध गया। इसलिये अगर देखा जाय तो भले ही ब्रिटिश भारत के लिये अगस्त का महीना क्रांति का महीना और 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस हो मगर समूचे भारत के लियेयह राष्ट्रीय एकता और अखण्डता का पर्व है।
 १५ अगस्त १९४७ के टाइम्स ऑफ इंडिया का मुखपृष्ठ 
15 अगस्त 1947 को जब ब्रिटिश भारत की स्वतंत्रता की घोषणा हुयी तो उस समय भारत में दो तरह की शासन व्यवस्थाएं थीं। इनमें से एक देशी रियासतों की सामंती व्यवस्था और दूसरी ब्रिटिश शासन व्यवस्था थी। ब्रिटिश भारत भी बंगाल, मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसियों और पूर्वी तथा पश्चिमी पाकिस्तान समेत भारत के 17 प्रोविन्सों में बंटा हुआ था। उस समय लगभग 562 देशी राज्य थे जिनमें बिलबाड़ी जैसी 27 की जनसंख्या वाली रियासत भी थी तो इटली देश से बड़ी हैदराबाद रियासत भी थी जिसकी जनसंख्या उस समय 1.40 करोड़ थी। आधुनिक भारत वर्ष का
कुल भौगोलिक क्षेत्र 32,87,240 वर्ग कि.मी. है जबकि एक अनुमान के अनुसार 15 अगस्त 1947 के दिन तक इन सभी रियासतों का क्षेत्रफल लगभग 7,12,508 वर्गमील या 11,40,013 वर्ग किमी था। कैबिनेट मिशन स्पष्ट कर चुका था कि देशी राज्यों को आन्तरिक और बाह्य सुरक्षा की जो गारण्टी  के बदले ब्रिटिश सरकार को इन राज्यों की सार्वभौम सत्ता हासिल है वह 15 अगस्त 1947 को संधि के समाप्त होने पर स्वतः ही समाप्त हो जायेगी और उन राज्यों या रियासतों की यह सार्वभौम सत्ता किसी अन्य को नहीं सौंपी जायेगी। सन् 1857 के गदर के बाद ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत का शासन ईस्ट इंडिया 
१५ अगस्त १९४७ के हिंदुस्तान टाइम्स का मुखपृष्ठ 
कंपनी से छीन कर अपने हाथ में लेने के बाद जब 1876 के अधिनियम के तहत ब्रिटिश साम्राज्ञी को ‘‘क्वीन एम्प्रेस ऑफ इंडिया’’ या भारत की महारानी घोषित किया गया तो इसके साथ ही राज्य हरण की नीति के बजाय देशी रियासतों को आन्तरिक और बाह्य सुरक्षा की गारण्टी दी गयी और उसके बदले उनकी सार्वभौम सत्ता (पैरामौंट्सी) ब्रिटिश क्राउन में सन्निहित हो गयी थी। इसमें देशी राज्यों के रक्षा, संचार, डाक एवं तार, रेलवे एवं वैदेशिक मामले ब्रिटिश हुकूमत में निहित हो गये थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेण्ट एटली ने 20 फरबरी 1947 को पार्लियामेंट में घोषणा कर दी थी कि देशी राज्यों पर जो ब्रिटिश पैरामौंट्सी (सार्वभौम सत्ता) है वह किसी अन्य को नहीं सौंपी जायेगी। इसलिये सरदार पटेल और वीपी मेनन ने बहुत ही होशियारी से सबसे पहले देशी राज्यों को भारत संघ में मिलाने से पहले उनसेइंस्ट्रूमेंट आफ एक्सेशनपर हस्ताक्षर करा कर स्वतंत्र निर्णय लेने के मामले में कानूनी तौर पर उनके हाथ बांध दिये थे। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से उन सबका भारत संघ में विलय करा दिया गया। इस प्रकृया में उड़ीसा के 36 राज्यों का विलय 15 दिसम्बर 1947 को तो कोल्हापुर और दक्कन ऐजेंसी के 17 राज्यों का विलय 8 मार्च 1948 को हुआ। सन् 1948 में ही सौराष्ट्र और काठियावाड़ की रियासतों का विलय हुआ। बुन्देलखण्ड और बाघेलखण्ड की 35 रियासतों का 13 मार्च 1948, राजपूताना की 19 रियासतों का विलय भी मार्च 1948 में, जोधपुर, जैसलमेर, जयपुर, एवं बीकानेर का 19 मार्च 1948, इंदौर, ग्वालियर झबुआ एवं देवास का जून 1949 में, पंजाब की 6 रियासतों का 1948 में, उत्तर पूर्व के मणिपुर का 21 सितम्बर 1948 को, त्रिपुरा का 9 सितम्बर 1949 को, कूच बिहार का 30 अगस्त 1949 को विलय हुआ। बड़े राज्यों में से हैदराबाद का पुलिस कार्यवाही के बाद 18 सितम्बर 1948 को अधिग्रहण किया गया। जबकि त्रावनकोर-कोचीन 27 मई 1949, कोल्हापुर फरबरी 1949 तथा मैसूर का विलय 25 नवम्बर 1949 को तथा हिमालयी राज्य टिहरी का विलय 1 अगस्त 1949 को हुआ।  सन् 1948 हिमाचल प्रदेश का गठन करने से पहले वहां की 27 रियासतों का संघ बनाया गया।
 १४  अगस्त १९४७ के  पाकिस्तान के प्रमुख अखबार  डॉन  का कवर पेज 
इसलिये देखा जाय तो इन रियासतों के लिये 15 अगस्त का दिन भले ही स्वतंत्रता का दिन हो मगर देशी राज्यों में बंटे शेष भारत में इसी दिन के बाद लोकतंत्रकामी आन्दोलन तेज हुये थे और टिहरी जैसे राज्यों में राजशाही से मुक्ति एवं लोकतंत्र की असली आजादी के लिये लोगों ने केवल लाठी डंडे खाये बल्कि शहादतें भी दीं। ब्रिटिश भारत में जहां कांग्रेस आजादी के लिये लड़ रही थी वहीं रियासतों में प्रजामण्डल सक्रिय थे। ये प्रजामण्डल भी कांग्रेस के ही अनुसांगिक संगठन थे जो कि सन् 1927 में बम्बई में गठित ‘‘अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद’’ (ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कान्फ्रेंस) के झंडे तले राजशाहियों के अन्दर उत्तरदायी शासन और जनता के मूलभूत अधिकारों के लिये लड़ रहे थे। देशी राज्य लोक परिषद कांग्रेस के इतने करीब थी कि इसकी कमान पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सन् 1939 में स्वयं संभाली जो कि 1946 तक इसके अध्यक्ष रहे। नेहरू के बाद डा0 पट्टाभि सीतारमैया ने परिषद की कमान संभाली जो कि 25 अप्रैल सन् 1948 में लोक परिषद के कांग्रेस में विलय के समय तक इसके अध्यक्ष और जयनारायण व्यास महासचिव पद पर रहे। इसी लोकपरिषद के तहत पंजाब हिल्स की टिहरी समेत हिमाचल की 35 रियासतों के प्रजामण्डलों के दिशा निर्देशन के लिये ‘‘हिमालयन हिल स्टेट्स रीजनल काउंसिल’’ का गठन किया गया।
दरअसल देशी रियासतें ब्रिटिश हुकूमत के लिये बफर स्टेट्स के समान थीं। सन् 1857 की गदर के दौरान अधिकतर देशी शासकों ने अंग्रेजों का साथ देकर उन्हें अहसास दिला दिया था कि भारत पर शासन करना है तो राज्य हरण की नीति पर चलने के बजाय उनसे मिल कर चलने में ही अंग्रेजी शासन की भलाई है। अंग्रेजों का इन पर नियंत्रण भी था और इनके प्रति सुरक्षा के अलावा कोई खास जिम्मेदारी भी नहीं थी। अंग्रेजों ने गदर के बाद राज्यहरण की नीति तो त्याग दी थी मगर देशी शासकों को दंडित करने और उनके उत्तराधिकारी के चयन का अधिकार अपने पास रख कर ब्रिटिश शासन ने उनकी सार्वभौमिकता के साथ ही उनकी बफादारी भी गिरवी रख दी। सन् 1921 में माउण्टफोर्ड सुधार के तहत देशी शासकों को अपनी जरूरतों और आकांक्षाओं को प्रकट करने के लियेचैम्बर ऑफ प्रिंसेजका गठन हो चुका था जिसे ‘‘नरेन्द्र मण्डल’’ भी कहा जाता था। इसके पहले चांसलर महाराजा बिकानेर गंगा सिंह बने। जवाहर लाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने के लिये जब देशी राज्यों के नरेन्द्र मण्डल से संविधानसभा में अपने प्रतिनिधि भेजने की अपील की तो भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह खान, जो कि नरेन्द्र मण्डल का चांसलर भी था, ने अपील ठुकरा दी। जबकि बिकानेर के महाराजा ने सबसे पहले अपना प्रतिनिधि संविधानसभा के लिये मनोनीत कर दिया। उसके बाद पटियाला, बड़ोदा, जयपुर और कोचीन के प्रतिनिधि भी संविधानसभा में शामिल हो गये। यह एक तरह से इन राजाओं की नयी व्यवस्था के साथ चलने की उत्सुकता थी। तत्कालीन गर्वनर जनरल माउंट बेटन नेचैम्बर ऑफ प्रिंसेजकी बैठक में साफ कह दिया था कि राज्यों का अपना अलग अस्तित्व बनाये रखना अब व्यवहारिक नहीं रह गया है इसलिये इन राज्यों को भारत या पाकिस्तान में से किसी के साथ भौगोलिक सम्बद्धता के अनुसार मिल जाना चाहिये।
चूंकि जितने देशी राज्य उतने प्रान्त बनाना संभव नहीं था इसलिये पूर्ण रूप से भारत संघ में इनके विलय से पहले एकीकरण की कार्यवाही की गयी और विलीनीकरण या मर्जर से पहलेइंट्रूमेण्ट ऑफ एक्सेशनपर देशी शासकों से हस्ताक्षर करा कर पटेल और मेनन ने एक तरह  बहुत ही सूझबूझ से उनकी सार्वभौमिकता हासिल कर ली। जिसके तहत देशी राज्यों को सुरक्षा, यातायात और वैदेशिक मामलों के अधिकार भारत संघ को मिल गये मगर उनकी आन्तरिक स्वायत्तता बरकरार रही। इस रतह वे स्वतंत्र देश के रूप में सीधे किसी अन्य राष्ट्र से सम्पर्क नहीं कर सकते थे। 15 अगस्त 1947 तक हैदराबाद, भोपाल और कश्मीर को छोड़कर 136 राज्यों ने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर कर दिये थे। भारत संघ में मिलने वाले 554 देशी राज्यों में से 551 तो इंस्ट्रूमेण्ट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर के बाद शंतिपूर्ण ढंग से भारत संघ में विलीन हो गये। लेकिन हैदराबाद और भोपाल के विलय में मामूली बल का प्रयोग करना पड़ा। जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान में मिलने की घोषणा कर पाकिस्तान भाग गया था और उसकी रियासत को जनमत के आधार पर भारत में मिलाना पड़ा जबकि कश्मीर के शासक ने भी स्वतंत्र रहने की घोषणा की थी लेकिन जब 1948 में पाकिस्तान की ओर से उस पर कबायली हमला हुआ तो उसने भी भारत संघ में विलय संधि पर हस्ताक्षर कर लिये। एकीकरण समय 216 छोटे राज्यों को निकटवर्ती प्रान्तों से जोड़ कर उन प्रान्तों को पार्ट- में रखा गया। उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के 39 राज्यों को सेंट्रल प्रोविन्स और उड़ीसा में जोड़ा गया जबकि गुजरात के राज्य बम्बई में मिलाये गये। इसी तरह के 61 छोटे राज्यों का एकीकरण कर उन्हें पार्ट-सी की श्रेणी में तथा कुछ राज्यों के पांच संघ बना कर उन्हें पार्ट-बी  की विशेष श्रेणी में रखा गया। इनमें संयुक्त प्रान्त पंजाब राज्य संघ राजस्थान संयुक्त प्रान्त त्रानकोर-कोचीन आदि शामिल थे। सन् 1956 में संविधान के सातवें संशोधन से पार्ट-बी श्रेणी समाप्त कर दी गयी।
देखा जाय तो भले ही अगस्त का महीना समूचे भारत के लिये क्रांति का महीना और ना ही 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस हो मगर जिस तरह ब्रिटिश भारत के नागरिकों की तरह रियासती प्रजा ने भारत की एकता और अखण्डता के लिये उत्साह दिखा कर अपने शासकों को भारत संघ में मिलने के लिये विवश किया था वह उत्साह उल्लेखनीय है और आज देश को कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक उसी उत्साह और एकता की भावना की जरूरत है।


जयसिंह रावत
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