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Tuesday, April 7, 2020

अंग्रेजों की व्यवस्था ही काम आ रही है इस संकट में 


अंग्रेज तो गये मगर संकट मोचक अवश्य छोड़ गये
-जयसिंह रावत
अंग्रेज चले गये और औलाद छोड़ गये, जैसी कहावतों से हम आज भी 190 साल पहले भारत छोड़ कर चले गये अंग्रेजों की उलाहना कर दते हैं। लेकिन हम भूल जाते हैं कि अंग्रेज हमारे लिये कई ऐसी चीजें और व्यवस्थाएं भी छोड़ गये थे जो कि आज भी हमारे काम आ रही हैं। उनमें से एक 1897 का महामारी रोकथाम कानून भी है जो कि संकट की इस घड़ी में हमारे काम आ रहा है। यही नहीं अत्याधुनिक विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के इस युग में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य का जो विशालतंत्र हमारे सामने खड़ा है उसकी बुनियाद भी वहीं अंग्रेज छोड़ कर चले गये थे।
कोरोना महामारी में अंग्रेजों का कानून ही संकटमोचक
Jay Singh Rawat author and journalist
कोविड-19 की तरह जब 1918 में स्पेनिश फ्लू की महामारी ने दुनियां में हाहाकार मचाया था तो उस समय भी आज की तरह चिकित्सा विज्ञान किंर्तव्यविमूढ़ था। इसलिये उस समय भी अंग्रेजों का बुबोनिक प्लेग से निपटने के लिये बनाया गया महामारी रोग कानून 1897 ही काम आया। उसके बाद भी भारत में जब भी हैजा, प्लेग, चेचक, मलेरिया एवं 1898 के असम के कालाजार एवं बेरीबेरी जैसी बीमारियां फैलीं तो यही ब्रिटिश कालीन कानून याद आया, जैसा कि कोविड-19 की महामारी फैलने पर भारत सरकार को इस बार याद आया। अंग्रेजों के जाने के बाद स्वतंत्र भारत में भी वर्ष 2018 में गुजरात में हैजा रोकने, 2015 में डेंगू के नियंत्रण के लिये चण्डीगढ़ में, 2009 में स्वाइन फ्लू रोकने के लिये पुणे में और आज देशभर में कोरोना वायरस की महामारी रोकने के लिये एकमात्र विकल्प के तौर पर इस कानून का प्रयोग किया जा रहा है। भले ही सप्तम् अनुसूची के तहत कानून व्यवस्था राज्य सरकार का दायित्व है, फिर भी भारत सरकार ने इसी कानून का डण्डा सारे देश पर घुमा रखा है। भारत ही क्यों ? आज सारे संसार में महामारी से बचने के लिये सोशियल डिस्टेंसिंग की जा रही है, जो कि एपिडेमिक डिजीज एक्ट 1897 का ही एक सबक है।
अंग्रेजों के साथ ही पाश्चात्य चिकित्सा का प्रवेश
सन् 1757 में प्लासी के युद्ध के बाद जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत में अंग्रेजी हुकूमत की नींव रखी तो उस समय देश में घोर गरीबी के साथ ही आम जनता में बीमारियों और स्वच्छता के प्रति जागरूकता में कमी के कारण हैजा, प्लेग एवं चेचक जैसी बीमारियां आम थी, जिनसे लाखों लोगों की जानें जातीं थी। उस समय भारत में बीमारियों के इलाज के लिये आज की जैसी पाश्चात्य चिकित्सा व्यवस्था न हो कर लोग परम्परागत नीम हकीम एवं वैद्यों पर निर्भर थे। सन् 1600 के आसपास जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के पहले फ्लीट के साथ पाश्चात्य दवाओं के साथ डाक्टरों की टीम भी पहुंची थी। कम्पनी द्वारा प्लासी के युद्ध के बाद भारत में अपनी प्रशासनिक एवं मिलिट्री सेवाएं शुरू किये जाने के साथ ही सबसे पहले कम्पनी के कर्मचारियों और सैनिकों की चिकित्सा और स्वास्थ्य के लिये 1764 में बंगाल में मेडिकल विभाग खोला गया, जिसमें 4 प्रमुख सर्जन, 8 सहायक सर्जन तथा 28 सर्जनों के सहयोगी तैनात किये गये। सन् 1775 में रॉयल इंडियन आर्मी से सम्बद्ध सर्जन जनरल और फिजिशियन जर्नल सहित हास्पीटल बोर्ड का गठन किया गया, जिसका काम यूरोपीय अस्पतालों का प्रशासन था। सन् 1785 में कम्पनी ने बंगाल, मद्रास और बम्बई प्रेसिडेंसियों में 234 सर्जन वाले एक चिकित्सा विभाग का गठन किया, जिसमें सिविल और मिलिट्री दोनों ही सेवाएं उपलब्ध थीं। सन् 1796 में हास्पीटल बोर्ड का नाम बदल कर मेडिकल बोर्ड कर दिया गया, जिसे नागर सेवाओं की जिम्मेदारी दी गयी।
ब्रिटिश साम्राज्ञी के शासन में चिकित्सा व्यवस्था
सन् 1857 की गदर के बाद भारत का प्रशासन ब्रिटिश साम्राज्ञी महारानी विक्टोरिया द्वारा अपने हाथ में लिये जाने के बाद भारत में सिविल सर्विसेज या नागर सेवाओं के लिये नये विभाग खोलने के साथ ही बंगाल में 1868 में एक अलग चिकित्सा विभाग खोला गया। इससे पहले 1864 में मिलिट्री मेडिकल आफिसर के अधीन सैनिट्री पुलिस फेर्स का भी गठन किया गया। सन् 1870 से लेकर 1879 तक प्रत्येक प्रेसिडेंसी में सनैनिट्री विभाग खोले गये। उससे पहले सभी प्रान्तों में सैनिट्री बोर्ड गठित किये गये। सैनिट्री इंस्पेक्टर जनरल के पद को बाद में सैनिट्री कमिश्नर के रूप में बदला गया। गवर्ननर जनरल के आदेश पर 1880 में सभी प्रान्तों में सैनिट्री इंजिनीयरों की नियुक्ति की गयी। इससे पहले सन् 1802 में चेचक के टीके की खोज होने के बाद वैक्सीनेशन के लिये सुप्रींटेंडेंट जनरल ऑफ वैक्सीनेशन की नियुक्ति हो गयी थी। सन् 1827 में भारत में भारतीय सहायक वैक्सीनेटरों के साथ 4 यूरोपीय वैक्सीनेशन सुप्रींटेंडेंट नियुक्त किये गये। सन् 1870 में टीकाकरण का कार्य सैनिट्री कमिश्नर की देखरेख में सौंपा गया।
इंडियन मेडिकल सर्विस का गठन
सन् 1869 भारत सरकार के अधीन एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आयुक्त और एक संाख्यकी अधिकारी की नियुक्ति की गयी। उसी वर्ष प्रेसिडेंसी प्रशासनिक व्यवस्था समाप्त करने के साथ ही तीनों प्रेसिडेंसियों के चिकित्सा विभागों का विलय कर इंडियन मेडिकल सर्विस (आइएमएस) का गठन किया गया। आइएमएस के गठन के बाद सेना के लिये पृथक रॉयल मेडिकल कोर (आरएएमसी) का गठन किया गया जो कि 1919 तक भारत सरकार के अधीन रही। उसी वर्ष मोन्टगोमरी-चेम्सफोर्ड संवैधानिक सुधारों के लागू होने के बाद सर्वाजनिक स्वास्थ्य स्वच्छता और सांख्यकी प्रान्तीय सरकारों को हस्तांतरित कर दिये गये। सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कदम आगे बढ़ाते हुये 1920-21 में म्युनिस्पैलिटी एवं लोकल बोर्ड एक्ट पास होने के साथ ही इन स्थानीय निकायों को लोक स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सौंप दी गयी। भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत प्रान्तीय सरकारों को अधिक स्वायत्तता दिये जाने के साथ ही सभी चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं को संघीय, संघीय एवं प्रान्तीय तथा प्रान्तीय, की तीन श्रेणियों में बांट दिया गया। सन् 1939 में पब्लिक हेल्थ एक्ट पास हुआ जो कि भारत में अपने तरह का पहला एक्ट था। सन् 1946 में भारत सरकार द्वारा देश में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाओं की स्थिति का सर्वे एवं सुधार हेतु सुझाव देने के लिये हेल्थ सर्वे एवं डेवेलपमेंट कमेटी (भोरे कमेटी)  का गठन किया गया। कमेटी के सुझाव पर देश की स्वास्थ्य सेवाओं की समीक्षा, मेडिकल रिलीफ, मेडिकल शिक्षा, मेडिकल रिसर्च और अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य पर काम शुरू हुआ। आजादी के बाद सर्जन जनरल के स्थान पर डाइरेक्टर जनरल ऑफ इंडियन मेडिकल सर्विसेज बना दिया गया।
भारत का पहला एलोपैथिक अस्पताल
मद्रास जनरल हास्पीटल भारत का पहला अस्पताल था जिसकी स्थापना 1679 में की गयी। उसके बाद 1796 में कलकत्ता में द प्रेसिडेंसी जनरल हास्पीटल नाम से दूसरा अस्पताल खुला। सन् 1800 से 1820 तक तक मद्रास में 4 अस्पताल खुल गये थे। डाक्टरों की कमी पूरी करने के लिये सन् 1835 में कलकत्ता में मेडिकल कालेज की स्थापना की गयी, जो कि एशिया का पाश्चात्य दवाओं पर आधारित पहला कालेज था। उसके बाद 1860 में लाहौर में मेडिकल स्कूल खुला। सन् 1854 में भारत सरकार छोटे अस्पतालों तक दवाएं एवं मेडिकल उपकरणों की सप्लाइ के लिये सहमत हुयी और इसके लिये कलकत्ता, मद्रास, बम्बई, मियां मीर और रंगून में सरकारी डिपो और स्टोर खोले गये। सन् 1918 में दिल्ली में लेडी रीडिंग हेल्थ स्कूल की स्थापना हुयी। कलकत्ता में सन् 1930 में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एण्ड पब्लिक हेल्थ की स्थापना हुयी और उसके बाद 1939 में कलकत्ता के पास सिंगूर में रूरल हेल्थ ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना हुयी। सन् 1880 तक ब्रिटिश शासनाधीन भारत में लगभग 1200 छोटे बड़े अस्पताल थे जो कि 1902 तक बढ़ कर 2500 तक पहुंच गये। सन् 1902 तक भारत में प्रत्येक 330 वर्गमील पर एक अस्पताल बन गया था। सन् 1880 में अस्पतालों में मरीजों की संख्या 74 लाख थी जो कि 1902 तक 2.2 करोड़ तक पहुंच गयी थी।
प्लेग से लाखों लोग मरे
सन् 1896 में जब बम्बई में प्लेग प्रकट हुआ तो उसके साथ ही इस बीमारी की बम्बई के बाद सूचनाएं अन्य बदंरगाह शहर, पुणे, कलकत्ता एवं करांची से आने लगीं। पहले साल तो महामारी बम्बई तथा उसके आसपास तक ही सीमित थी लेकिन दूसरे साल महामारी बंगाल, मद्रास, संयुक्त प्रान्त, मध्य प्रान्त, पंजाब, मैसूर, हैदराबाद और कश्मीर तक फैल गयी जिसमें सरकारी रिकार्ड के अनुसार 20 लाख तक लोग मारे गये। लेकिन गैर सरकारी अनुमानों ने कहीं अधिक मौतों के संकेत दिये। यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापारिक मार्ग होने के कारण ब्रिटिश सरकार पर इसे रोकने के लिये भारी दबाव था। वैसे भी उसे अपने अधिकारियों और सैनिकों की रक्षा की भी चिन्ता थी। इस बीमारी पर नियंत्रण के लिये ब्रिटिश सरकार ने 1896 में प्लेग आयोग का गठन किया जिसकी राय थी कि इस अत्यन्त संक्रामक रोग के फैलने का मुख्य कारण लोगों का एक दूसरे से सम्पर्क है, जिसे तोड़ कर संक्रमण की चेन तोड़ी जा सकती है। इस प्रकार देश को 1897 को महामारी कानून मिला जिसका प्रयोग हर बीमारी के संकट में होता रहता है।
महामारी में मरते रहे लाखों लोग
इंपीरियल गजट ऑफ इंडिया के अनुसार वर्ष 1881-90 के बीच भारत की जनसंख्या 20,37,78,338 थी जबकि इस अवधि मंे हैजा, चेचक, ज्वर, अतिसार एवं अन्य बीमारियों से देश के विभिन्न हिस्सों में 49,86,950 लोग मारे जिनमें हैजा से मरने वालों की संख्या 3,06,518 एवं चेचक से मरने वालों की संख्या 1,22,772 थी। उस दौरान सबसे ज्यादा 33,59,927 लोग अकेले ज्वर से मरे थे। इसी प्रकार 1891-1900 के बीच 65,71,397 लोग विभिन्न व्याधियों से मरे जबकि उस दौरान देश की जनसंख्या 21,77,00,151 ही थी। उस दौरान हैजा से 4,50,502, चेचक से 82,588 ज्वर से 43,63,055 अतिसार या दस्त से 2,78,298 एवं अन्य रोगों से 13,96,936 लोग मरे। उस समय इन बीमारियों का असली कारण मालाबार, सूरत, कोचीन, कलकत्ता, मद्रास और बम्बई बंदरगाह शहरों के विकास एवं औद्योगीकरण से जनसंख्या का कुछ ही शहरों में बेतरतीव जमाव था। पलायन के कारण यही नौबत अब पुनः आ रही है।

जयसिंह रावत
ई-11, फ्रेंड्स एन्कलेव, शाहनगर
डिफेंस कालोनी रोड, देहरादून
उत्तराखण्ड।
Mobile-9412324999
jaysinghrawat@gmail.com

कुम्भ का हैजा बद्रीनाथ-माणा  तक फैलता था 

चारधाम यात्रा और कुंभ पर भी कोरोना की काली छाया

-जयसिंह रावत
दुनियाभर में त्राहिमाम-त्राहिमाम मचाने वाली कोरोना महामारी ने इस वर्ष की हिमालयी तीर्थों की चारधाम यात्रा को तो संकट में डाल ही दिया मगर इसकी छाया आगामी हरिद्वार महाकंुभ पर भी पड़ती नजर आ रही है। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा अप्रैल महीने के अंतिम सप्ताह से प्रस्तावित है, जिसमें देश विदेश से 30 लाख से अधिक तीर्थयात्रियों के आने की संभावना है। जबकि हरिद्वार महाकुंभ का पहला स्नान 14 जनवरी 2021 को होना है जिसकी तैयारियों इस साल बरसात समाप्त होते ही शुरू हो जानी है और इस महापर्व के लिये रमते पंच सहित अखाड़ों का आगमन इसी साल शुरू हो जायेगा। जब लोगों के घरों से निकलने की पाबंदी हो और मंदिर मस्जिद सभी बंद हों तो फिर चारधाम यात्रा की संभावनाएं स्वतः ही क्षीण हो जाती हैं।
Jay Singh Rawat journalist & author
इस बार बदरी-केदार के दर्शन मुश्किल
कोरोना की विश्वव्यापी महामारी के महाखौफ से काफी पहले ही बसन्त पंचमी के अवसर पर बदरीनाथ के कपाट खोलने की तिथि 30 अप्रैल को और महाशिरात्रि के अवसर पर केदारनाथ के कपाट खोलने की तिथि 29 अप्रैल को प्राचीन परम्परानुसार घोषित हो चुकी है। गंगोत्री एवं यमुनोत्री के कपाट सदैव अक्षय तृतीया पर खुलते हैं जो कि इस साल 26 अपै्रल को आ रही है। इस तरह देखा जाय तो इन हिमालयी तीर्थों के दर्शनों की शुरुआत 26 अप्रैल से होनी है, जिसके लिये कम से कम दो दिन पहले ऋषिकेश से इस वर्ष की यात्रा का श्रीगणेश होना है। जब कोरोना के खौफ से देश के सारे मंदिर और मस्जिद श्रद्धालुओं के लिये बंद कर दिये गये हैं तो हिमालय के पवित्र धाम बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री में श्रद्धालुओं का स्वागत होगा, ऐसा संभव नहीं लगता है। वैसे भी इतिहास गवाह है कि गढ़वाल में हैजा और चेचक जैसी महामारियां तीर्थ यात्रियों के माध्यम से आती थीं और यात्रियों से संक्रमित डण्डी-कण्डी वाले पोर्टरों के माध्यम से पहाड़ के गावों तक पहुंचती थीं।
यात्रा को लेकर सरकार भी असमंजस में
इस वर्ष की यात्रा के लिये धार्मिक औपचारिकताएं शुरू हो गयी हैं मगर कोरोना संकट खौफजदा उत्तराखण्ड सरकार को इस बारे में कुछ भी नहीं सूझ रहा है। प्रदेश के पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज भी यात्रा के बारे में कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। उनका कहना है कि 15 अपै्रल को लॉकडाउन को आगे बढ़ाने या स्थगित करने के निर्णय के बाद ही केन्द्र सरकार से जो भी निर्देश आयेंगे, उसी हिसाब से राज्य सरकार आगे बढ़ेगी। राज्य सरकार वैसे ही संसाधनों के साथ ही अनुभव की कमी से जूझ रही है। अगर इसके बाद लॉकडाउन खुल भी गया तो भी कम से कम मई के महीने तक मंदिरों में यात्रियों को प्रवेश मिलने की संभावना काफी क्षीण ही है। और जून के दूसरे पखवाड़े से मानसून शुरू हो जाता है। वैसे भी 15 अप्रैल के बाद यात्रा के लिये केवल 10 दिन बचते हैं और इतने कम समय में लाखों लोगों के आगमन के लिये परिवहन, सफाई, पेयजल, आवास, चिकित्सा और भोजन आदि के साथ ही मंदिर में टनों के हिसाब से भोग और पूजा सामग्री की व्यवस्था करना आसान नहीं है। बदरीनाथ में चंदन की लकड़ी भी कर्नाटक से मंगाई जाती है। राज्य सरकार वैसे ही मंदिर समिति को समाप्त कर नये चारधाम देवस्थानम् बोर्ड का गठन कर चुकी है जिसमें नौकरशाहों की भरमार है जिन्हें यात्रा का संचालन करने का अनुभव नहीं है। उत्तराखण्ड की आर्थिकी काफी हद तक चारधाम यात्रा पर निर्भर है और अगर यात्रा नहीं चली तो भुखमरी की नौबत आ सकती है।
मंदिर तो खुलेंगे मगर यात्रियों के लिये नहीं
आदि गुरू शंकराचार्य के आगमन के बाद लगभग ढाइ हजार सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ जबकि बदरीनाथ या केदारनाथ के कपाट निश्चित मुहूर्त पर न खुले हों। प्राचीन परम्परानुसार कपाट खुलने से पहले ज्योतिर्पीठ से शंकराचार्य की गद्दी और पाण्डुकेश्वर से उद्धव और कुबेर की भोगमूर्ति बदरीनाथ जाती है। इनके साथ ही शंकराचार्य, वेदपाठी, धर्माधिकारी और पण्डे भी बदरीनाथ पहुंच जाते हैं। इसी प्रकार ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ से केदारनाथ की पंचमुखी भोग मूर्ति केदारनाथ रवाना होती है तो मुखवा और खरसाली से भी गंगोत्री और यमुनोत्री की मूर्तियां अपने धाम जाती हैं। परम्परानुसार इस बार इन मंदिरों के कपाट तो अवश्य ही खुलेंगे मगर मंदिरों में बिना श्रद्धालुओं के ही धार्मिक औपचारिकताएं पूरी होंगी। यद्यपि बरसात में सड़क टूटने से यात्रा कुछ समय के लिये अवरुद्ध अवश्य होती है, मगर सड़क खुलते ही यात्रा फिर शुरू हो जाती है। केवल 2013 की केदारनाथ आपदा के समय यात्रा रोकी गयी थी। यातायात के साधनों के विकास के साथ ही इन विश्वविख्यात धर्मस्थलों पर यात्रियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार गत वर्ष बदरीनाथ में 11.74 लाख, केदारनाथ में 10 लाख, यमुनोत्री में 4.66 लाख तथा गंगोत्री में 5.31 लाख श्रद्धालुओं ने दर्शन किये थे। इनके अलावा हेमकुण्ड साहिब में 2.41 लाख सिख यात्रियों ने अरदास की। इतने लोगों का जमवाड़ा महामारी के लिहाज से बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
कुंभ से ही फैलता था हैजा महामारी का प्रकोप
महामारी का संकट तो साल की चारधाम यात्रा पर नजर आ ही रहा है, लेकिन इसकी काली छाया आगामी महाकुंभ पर भी अभी से नजर आने लगी है। अगर इस साल के अंत तक विश्व कोरोना के खतरे से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ तो शायद ही भारत सरकार इतिहास से सबक लेकर 2021 के महाकुंभ के आयोजन की अनुमति देगी। इतिहास गवाह है कि हरिद्वार कुंभ के दौरान जब भी हैजा फैला उसका विस्तार देश के अन्य हिस्सों में होने के साथ ही गढ़वाल के लिये बेहद मारक साबित हुआ। गढ़वाल में सन् 1857, 1867 एवं 1879 की हैजे की महामारियां हरिद्वार कुंभ के बाद ही फैलीं थीं। सन् 1857 एवं 1879 का हैजा हरिद्वार से लेकर भारत के अंतिम गांव माणा तक फैल गया था। हरिद्वार कुंभ के बाद शुरू हुयी तीर्थयात्रा में संक्रमित तीर्थयात्रियों से वह महामारी फैली थी। सन् 1897में महामारी रोकथाम अधिनियम के अस्तित्व में आने के बाद 1882 के हैजे के दौरान तत्कालीन असिस्टेंट कमिश्नर गढ़वाल ने भी लॉकडाउन लागू करते हुये एक संक्रमण वाले जिले के लोगों के दूसरे जिले में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
हैजा फैलने पर लोग गांव छोड़ भाग जाते थे
हिमालयन गजेटियर वॉल्यूम 3 में ई.टी. एटकिन्सन ने कहा है कि हैजे के दौरान गढ़वाल के चारधाम यात्रा मार्ग पर अगर कोई हैजा पीड़ित मर जाता था तो उसके सहयात्री उसके शव को वहीं सड़क पर छोड़ कर आगे बढ़ जाते थे। इसी प्रकार संक्रमित यात्रियों के बोझा ढोने या उण्डी कण्डी वाले गढ़वाली पोर्टर जब अपने गांव जाते थे तो वे भी संक्रमण फैला देते थे। उस समय स्वच्छता पर लोग इतना ध्यान नहीं देते थे। गांव में हैजा फैलने पर गांव वाले बीमार को बिना इलाज के जानरों की तरह मरने के लिये अकेला छोड़ कर जंगल भाग जाते थे। मृतकों को जलाया तक नहीं जाता था। इसलिये विषाणु नदी नालों, हवा वर्षा से फैल जाते थे। उन दिनों कुंभ के अलावा भी चारधाम यात्रियों में कई दिनों का पकाया हुआ भोजन खाने और प्रदूषित जल पीने से भी हैजा जैसी महामारियां फैल जातीं थीं। गजेटियर के अनुसार हैजे से गढ़वाल में वर्ष 1903 में 4017, 1904 में 188, 1906 में 3429, 1908 में 2924, 1909 में 1736, 1910 में 782 और 1911 में 76 लोग मारे गये थे।
पहले भी महामारी में होता था लॉकडाउन
हरिद्वार कुंभ में भी हैजा फैलने पर सहयात्री बीमार और मृतक को छोड़ कर भाग जाते थे। सन् 1879 में जब गढ़वाल के असिस्टेंट कमिश्नर को यह सूचना मिली तो उसने अपने कर्मचारियों को सड़कों पर पड़े शवों को जलाने के आदेश देने के साथ ही कुंभ गये गढ़वाली यात्रियों को जहां के तहां रुकने का आदेश दिया। उस समय प्रशासन ने गावों में दवाइयों और अफीम के साथ मेडिकल टीमें भेज दीं थीं। उस समय के लॉकडाउन में भी एक गांव से दूसरे गांव जाने पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया गया था। उत्तराखण्ड में राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी के कारण समुचित ढंग से कोरोना संकट का सामना नहीं हो पा रहा है। सरकार स्वयं ही भ्रम और असमंजस की स्थिति में है छोटी से बात के लिये भी केन्द्र सरकार का मुंह ताक रही है। राज्य सरकार के पास आने वाली इस चुनौती से निपटने के लिये कोई प्लान तो रहा दूर कोई सोच तक नहीं है।   

Friday, April 3, 2020

Uttarakhand Himalaya: महामारी सिर पर और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र जी मग्न ...

Uttarakhand Himalaya: महामारी सिर पर और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र जी मग्न ...: उत्तराखण्ड : महामारी सिर पर और चिकित्सा इंतजाम बद्तर - जयसिंह रावत संकट की इस घडी में सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्री जी का...

महामारी सिर पर और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र जी मग्न हैं


उत्तराखण्ड: महामारी सिर पर और चिकित्सा इंतजाम बद्तर
-जयसिंह रावत
संकट की इस घडी में सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्री
जी का मुस्कराता चेहरा माहमारी के बारे में
 उनकी गंभीरता को बयां कर रहा है।
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उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत पार्टी नेतृत्व के समक्ष अपने नम्बर बढ़ाने के लिये कोरोना की महामारी से निपटने के लिये चाहे जितने भी दावे कर लें, मगर हकीकत यह है कि उनका स्वास्थ्य विभाग स्वयं वेंटिलेटर पर है जो कि डाक्टरों और पैरा मेडिकल स्टाफ की कमी से तो पहले से ही जूझ रहा था, लेकिन अब उसके सामने महामारी से निपटने के लिये वेंटिलेटर और मास्क जैसे जैसे मूलभूत चिकित्सा उपकरणों की भारी कमी का भी संकट खड़ा हो गया है। यही नहीं राज्य में समय से मरीजों के लिये पर्याप्त संख्या में आइसोलेशन वार्डों और क्वारेंटाइन बिस्तरों का इंतजाम भी पर्याप्त नहीं है। भेड़ बकरियों की तरह ठूंसे गये बंदियों के कारण राज्य की जेलें संक्रमण केन्द्र साबित हो सकती हैं। संदिग्धों के रक्त के नमूनों की जांच के लिये अब जा कर ऋषिकेश एम्स में दूसरे टेस्टिंग लैब की व्यवस्था हो पायी है।संकट की इस घडी में सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्री जी का मुस्कराता चेहरा माहमारी के बारे में उनकी गंभीरता को बयां कर रहा है। 
दुनियाभर में कोरोना महामारी फैलाने वाले चीन की सीमा से लगे उत्तराखण्ड की सरकार की नींद अब खुल रही है जबकि महामारी प्रकट हो कर फैलने भी लग गयी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन गत 30 जनवरी को ही कोरोना को महामारी घोषित कर चुका था लेकिन पहले ही डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ और अन्य मेडिकल सुविधाओं की कमी झेल रहे इस प्रदेश की सरकार को अब डाक्टरों का इंतजाम करने की जिम्मेदारी याद आ रहा है। सवा करोड़ की आबादी वाले इस राज्य में सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में कुल 308 वेंटीलेटर हैं, और इनमें से भी सरकारी अस्पतालों में केवल 165 ही वेंटिलेटर उपलब्ध हैं। कोरोना संक्रमित 15 प्रतिशत निमोनिया पीड़ितों में से भी लगभग 6 प्रतिशत को वेंटिलेटर की जरूरत होती है। सरकार ने अब 100 वेंटिलेटर खरीदने की प्रकृया शुरू की। इसी प्रकार राज्य की एक करोड़ से अधिक आबादी पर अब तक केवल 1 हजार आइसोलेशन और 1500 क्वॉरेंटाइन बेड तैयार किये जा सके। जबकि दिल्ली आदि नगरों से 18 हजार से अधिक प्रवासी अपने गावों में आ चुके हैं और हजारों अन्य दिल्ली आदि नगरों में लॉकडाउन के कारण फंसे हुये हैं। जिनके परीक्षण की पूरी व्यवस्था सरकार के पास नहीं है। टेस्टिंग लैब की कमी के चलते प्रदेश में नमूनों की जांच भी बहुत धीमी गति से चल रही है। एक सरकारी अफसर के अनुसार संसाधनों के अभाव में इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रतिदिन औसतन 40 ही सैंपल लिये जा रहे थे। नीति आयोग द्वारा जारी ‘‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’’ रिपोर्ट में स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं के इंडेक्स में उत्तराखण्ड को 19वें स्थान पर सबसे खराब स्थिति वाले उत्तर प्रदेश और बिहार के साथ रखा गया है, जबकि यह विभाग स्वयं मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के पास है।
कोरोना की महामारी से निपटने के लिये डाक्टरों, पैरा मेडिकल स्टाफ एवं सैंपल लेने वालों के लिये आंखों, चेहरे, हाथों के लिये विशेष दस्ताने, चस्में और मास्क, शरीर के लिये विशेष प्लाटिक कवच, सिर ढकने का कवर, 95 नम्बर का रिस्पेरेटरी मास्क, फ्लुइड रेजिस्टेंट गाउन एवं प्लास्टिक का एपरन जैसे लगभग 23 मेडिकल इक्विपमेंट्स की जरूरत होती है। सरकार ने आइसोलेशन वार्डों की घोषणा तो कर दी मगर उनमें साजो सामान का अभाव है, जिस कारण मेडिकल स्टाफ के लिये भी खतरा है। राज्य के आयुर्वेदिक और होम्योपैथिक अस्पतालों में तो दस्ताने और मास्क खरीदने के लिये तक बजट नहीं है। राज्य में 12 जिला अस्पताल, 21 उप जिला अस्पताल, 80 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र, 614 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डाक्टरों और पैरा मेडिकल सहित कुल जरूरी 8945 पदों में से 2751 पद खाली पड़े हैं। खाली पदों में डाक्टरों के 1253, नर्सों के 349 और फार्मसिस्टों के 150 पद शामिल हैं। हाल ही में बजट सत्र में रखे गये एक दस्तावेज के अनुसार चिकित्सा एवं लोकस्वास्थ्य विभाग में विभिन्न श्रेणियों के कुल 11,379 में से 3,403 पद खाली हैं। विशेषज्ञ डॉक्टरों के कुल 1258 में से 843 पद खाली चल रहे हैं। कोरोना के प्रकोप के मामले में हिमालयी राज्यों में उत्तराखण्ड जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के बाद तीसरे नम्बर पर आ चुका है और त्रिवेन्द्र को डाक्टरों की कमी दूर करने की याद अब आ रही है।कहते हैं चेहरा आदमी के मस्तिष्क का आईना होता है।  राज्य के सुचना एवं जन संपर्क विभाग द्वारा जारी किये गए  कोरोना संकट  सम्बन्धी मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत जी की अपील  के विज्ञापन में मुख्य मंत्री जी की प्रसन्नचित मुख मुद्रा से ही पता चल रहा है की वह इस संकट की घडी में कितने गंभीर हैं।  अब आप स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं कि किस तरह संकट  की इस घडी का सामना किया जा रहा होगा. 
महामारी के मामले में सर्वाधिक चिन्ताजनक स्थिति राज्य की जेलों की बनी हुयी है। राज्य की कुल 11 जेलों की क्षमता 3540 बंदियों को रखने की है जबकि उनमें अभी 5748 बंदी रखे गये हैं। सर्वाधिक खतरनाक स्थिति हल्द्वानी जेल की है जहां 382 की क्षमता के विपरीत 1304, देहरादून में 580 के विपरीत 1305 और अल्मोड़ा में 102 की क्षमता के विपरीत 232 बंदी रखे गये हैं। कुुल 3489 विचाराधीन कैदियों में 801 देेहरादून, 526 हरिद्वार, 122 नैनीताल, 96 अल्मोड़ा, 50 चमोेली, 83 पौड़ी, 113 टिहरी, 468 रूड़की, 1158 हल्द्वानी, 72 केन्द्र्रीय कारागार सितारगंज जेल में हैै।
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत के तुगलकी फरमान और राज्यवासियों के प्रति असंवेदनशीलता भी लोगों की तकलीफें बढ़ा रही है। अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिये त्रिवेन्द्र रावत ने हरिद्वार आदि में रुके लगभग डेढ हजार गुजरातियों को वापस भेजने के लिये परिवहन निगम की लक्जरी बसों का इंतजाम तो किया मगर उन्हीं बसों से गुजरात में फंसे उत्तराखण्ड के लोगों को वापस लाने की जरूरत नहीं समझी। अपने राज्य की बसें देख कर कुछ संकटग्रस्त उत्तराखण्डी बसों में बैठे भी तो उन्हें हरियाणा बार्डर पर उतार दिया गया और उत्तराखण्ड सरकार ने मांगने पर भी उनकी मदद नहीं की। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट 26 अपै्रल से खोलने के मुहूर्त घोषित हो गये मगर इस साल की चारधाम यात्रा चलेगी या नहीं, अभी तक त्रिवेन्द्र सरकार हर बात की तरह अमित शाह के निर्देशों की प्रतीक्षा कर रही है। जबकि परिवहन कंपनियों की डेढ हजार बसों की बुकिंग केंसिल हो चुकी है। जून में सीमान्त क्षेत्रों से भारत और तिब्बत के बीच होने वाले व्यापार के बारे में भी सरकार बेखबर है।