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Sunday, November 5, 2017
Saturday, November 4, 2017
Thursday, November 2, 2017
उत्तराखण्ड में अब चकबंदी पर राजनीतिक लफ्फाजी
उत्तराखण्ड में चकबंदी कितनी संभव ?
उत्तराखण्ड
में केवल
13 प्रतिशत जमीन कृषि
योग्य है जो
कि लगभग 7 लाख
हैटेअर के आसपास
बैठती है। इसमें
से लगभग 80 हजार
हेक्टेअर कृषि वाली
जमीन से पिछले
17 सालों में पलायन
के कारण खेती
गायब हो गयी
है। एक अनुमान
के अनुसार कुल
भूभाग में से
लगभग 6 या 7 प्रतिशत
पर ही खेती
हो रही है
या यूं कहें
कि इतनी ही
जमीन आबाद है
शेष जमीन को
लोगों ने त्याग
दिया है। इतनी
कम कृषि भूमि
पर भी 70 प्रतिशत
जोतें आधा हेक्टेअर
से छोटे आकार
की हैं। ऐसी
स्थिति में पहाड़ों
में खेती करना
बहुत ही अलाभकर
और बेहद श्रमसाध्य
है। लोगों के
एक खेत की
दूसरे खेत से
दूरी बहुत अधिक
होती है इसलिये
वहां भूमि सुधार
की गुंजाइश भी
नहीं रह गयी
है। इसीलिये लोग
बड़े पैमाने पर
पलायन कर रहे
हैं। ऐसी स्थिति
में अगर चकबंदी
होती है तो
वह कई समस्याओं
को हल कर
सकती है लेकिन
चकबंदी जितनी आसान समझी
जा रही है
उतनी आसान है
नहीं। कई दशक
पहले उत्तर प्रदेश
के जमाने में
पहाड़ों में सबसे
पहले त्रिवेन्द्र सिंह
रावज जी के
जिले पौड़ी में
ही चकबंदी कार्यालय
खुला था लेकिन
व्यवहारिक कठिनाइयों के कारण
वहां एक इंच
जमीन पर चकबंदी
नहीं हो सकी।
खटीमा में 1984 में
चकबंदी कार्यालय खुला तो
वहां भी एक
इंच जमीन पर
भी चकबंदी नहीं
हो सकी। कारण
यह था कि
वहां ज्यादातर जमीन
थारू और बोक्सा
जनजातियों की थी
जिस पर बाहरी
लोगों ने कब्जा
रखा है। इसलिये
वहां जिसके नाम
जमीन है उसके
कब्जे में जमीन
नहीं है। जिसके
कब्जे में जमीन
है उसके नाम
जमीन नहीं है।
भारत में पहला
भूमि सुधार कानून
उत्तर प्रदेश में
1950 में आया था।
वह कानून उत्तर
प्रदेश जमींदारी विनाश एवं
भूमि सुधार अधिनियम
1950 था जो कि
1960 में लागू हुआ।
वह कानून पहाड़ों
के लिये व्यवहारिक
नहीं था इसलिये
उत्तराखण्ड के लिये
कूजा ऐक्ट बनाया
गया। उस कानून
के हिसाब से
पहाड़ों में जोतें
इतनी छोटी हो
गयीं कि उनका
विभाजन नहीं हो
सकता। एक ही
खाते में सौ
से अधिक खतेदारों
के नाम भी
हैं। ये खातेदार
पलायन के कारण
कोई दिल्ली में
है तो कोई
कलकत्ता में है।
उनसे उनके नाम
की जमीन के
बारे में सहमति
कैसे लेंगे? एक
ही गांव में
कई किश्म की
जमीन होती है।
उनकी लोकेशन के
हिसाब से भी
उनकी कीमत और
महत्व में अंतर
होता है। कम
उपजाऊ और दूर
जंगल के निकट
की जमीन को
आप चकबंदी में
किसे थमायेंगे? जनजातियों
की जमीनें कैसे
किसी अन्य को
देंगे? गावों में कोई
रह नहीं गया
है, उनकी जमीनों
का क्या करेंगे?
अगर चकबंदी इतनी
आसान होती तो
इससे पहले जब
त्रिवेन्द्र सिंह रावत
कृषिमंत्री थे तो
उन्होंने एक चकबंदी
नीति बनायी थी।
वह नीति लागू
क्यों नहीं हो
सकी? दरअसल चकबंदी
की बात वो
नेता कर रहे
हैं जो कि
अपने गांव छोड़
कर मैदानों में
बस गये हैं।
उन्होंने अपनी कई
पीढ़ियों के लिये
कमाई कर ली
है और उनके
लिये अब गांव
की जमीन का
कोई महत्व नहीं
रह गया है।
इसलिये उनकी बला
से उनके गांव
की जमीन का
कुछ भी हो
जाय।
Wednesday, November 1, 2017
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव- 2017 तथ्य एक नजर में
हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव- 2017 तथ्य एक नजर में
क्षेत्रफल और मतदाताओ की संख्या के आधार पर सबसे छोटे और बड़े विधानसभा क्षेत्र
हिमाचल प्रदेश में क्षेत्र के अनुसार शिमला विधानसभा सबसे छोटी विधानसभा है जबकि लाहौल और स्पीति सबसे बड़ा विधानसभा क्षेत्र है। मतदाताओ की संख्या के आधार पर 22,995 मतदाताओ के साथ लाहौल और स्पीति विधानसभा क्षेत्र सबसे छोटा और सुलाह विधानसभा क्षेत्र 95,064 मतदाताओ के साथ सबसे बड़ी विधानसभा है।
राज्य की 68 विधानसभाओं में मतदाताओं की संख्या नीचे तालिका में दी गई है:
| मतदाताओं की संख्या | विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की संख्या |
| <100000 | सभी 68 विधानसभा क्षेत्र |
| 100000 - 150000 | नगण्य |
| 150000 - 200000 | नगण्य |
| > 20000 | नगण्य |
वे मतदाता जिन्हें मतदाता चित्र सहित पहचान पत्र प्राप्त हुआ है, उन्हें लिंग अनुसार श्रेणीबद्ध किया गया है, जैसा कि नीचे तालिका में पुरूष एवं महिला वर्ग में दिखाया गया है।
| पुरूष | महिला | अन्य | कुल | |
| जनसंख्या | 37,43,619 | 36,40,293 | 0 | 73,83,912 |
| मतदाताओं का विस्तार | 25,31,321 | 24,57,032 | 14 | 49,88,367 |
| नियमित ईपीआईसी | 25,31,318 | 24,57,030 | 14 | 49,88,362 |
आयु और लिंग अनुसार मतदाताओं की संख्या :
| आयु | पुरूष | महिला | तृतीय वर्ग | कुल |
| 18-25 years | 3,83,524 | 3,50,992 | 6 | 7,34,522 |
| 25-40 | 9,12,317 | 8,77,614 | 4 | 17,89,935 |
| 40-60 | 8,36,370 | 8,05,712 | 4 | 16,42,086 |
| >60 | 3,99,110 | 4,22,714 | 0 | 8,21,824 |
| कुल मतदाता | 25,31,321 | 24,57,032 | 14 | 49,88,367 |
हिमाचल प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी के अनुसार राज्यस्तर पर कोई भी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल नहीं है।
***
उत्तराखंड आंदोलन की पगार चाहते हैं ये उत्तराखंड आंदोलनकारी
उत्तराखंड आंदोलन की पगार चाहते हैं ये उत्तराखंड आंदोलनकारी
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी अब खुद के हक के लिए आंदोलनरत हैं... लगता है इन लोगों ने उत्तराखंड राज्य के लिए नहीं बल्कि अपनी पेंशन के लिए धरने प्रदर्शन किये थे और नारे लगाए थे। इनको ये चिंता नहीं कि राज्य कहाँ जा रहा है....... इनको ये चिंता नहीं कि यहाँ सत्ताधारियों और सत्ता के दलालों के साथ ही भ्रष्ट नौकरशाहों ने लूट मचा रखी है...... इनको ये चिंता है कि उनको राज्य के दुर्लभ संसाधनों की बंदरबांट में हिस्सा क्यों नहीं मिल रहा है.... अगर ये आंदोलन का भाड़ा मांग रहे हैं तो क्या ये भाड़े के आंदोलनकारी थे ? उत्तराखंड के निर्माण में प्रदेश के हर नागरिक ने भाग लिया था... लेकिन अब 1 दिन भी राज्य निर्माण के आंदोलन के दौरान जेल में रहने वाले आंदोलनकारी खुद को सात दिन जेल में रहने वालों के समान दर्जा और सुविधा देने की मांग कर रहे हैं... आंदोलनकारियों की ये मांगें लेकिन कहां तक जायज हैं... जब सभी ने अपना सहयोग राज्य निर्माण में दिया है तो इस तरह कि मांगें क्यों रखी जा रही हैं…..
Tuesday, October 31, 2017
Chhat Holiday in Uttarakhand Will Open Pandor's Box
Chhath
holiday triggers demand for public holidays on Uttarakhand hill festivals
DEHRADUN Updated: Oct 27, 2017 20:49 IST
Neha Pant
Hindustan Times
Uttarakhand natives have demanded that public holidays be
declared on festivals indigenous to the hill state after the BJP government
announced one for Chhath, celebrated mainly by natives of Bihar and eastern
Uttar Pradesh.
Earlier this week, the Trivendra Singh Rawat government
had declared a public holiday on October 26 on account of Chhath Pooja,
dedicated to the worship of the Sun God and his wife Usha.
Last year, the erstwhile Congress government of chief
minister Harish Rawat, too, had announced a public holiday on Chhath, evoking a
similar backlash from the hill community for allegedly giving preference to
festivals celebrated by non-native communities over those belonging to
Uttarakhand.
Underlining how the pahadi (hill) community felt
“neglected” in their own land, Suyash Kukrety of Yuva Garhwal Sabha, a
socio-cultural organization, said, “We welcome holiday on Chhath, but what
about (declaring holidays on) the native festivals of Uttarakhand?”
In a letter to the CM, Kukrety wrote, “I’m hopeful that
you’ll declare holidays for our own festivals like the upcoming Igas (a
post-Diwali festival to be celebrated on October 30) also, lest the public of
Uttarakhand should view it (Chhath holiday) as your stunt for political gains.”
Alleging how neither the previous Congress nor the
current BJP government were “serious about the pahadi culture”, activist Amit Gusain
‘Pahadi’ said, “We should not even expect him (CM Rawat) to declare holidays on
our local festivals which are being pushed into oblivion by the successive
governments. Our state was formed after such a long struggle, so much for the
respect of hill sentiments!”
Darshan Singh Rawat, media coordinator for CM Rawat, said
that the government would consider declaring holidays on major hill festivals.
He, however, rejected the allegation that there was any political motivation
behind declaring a holiday on Chhath.
Even current CM’s official social media account was
flooded with similar comments, with many asking if the hill state’s native
festivals, too, would qualify for holidays.
“Sir, aapne Uttarakhand ke kitne local tyoharon par
avkash ghoshit kiya (Sir, how many holidays were declared on local festivals)?”
asked one Twitter user Mohit.
User Rajesh Juglan urged CM Rawat to ‘shut the critics up
by declaring a public holiday on Uttarakhand’s native festival Igas’. Some even
called for development instead of holidays.
“Sir ji humko avkash nahin, sthayi rozgar chahye (Sir, we
want employment, not holidays),” wrote another user Vikram Singh Rawat.
Political observers, meanwhile, said such decisions by
governments were often taken “on political grounds” and inevitably led to the
opening of a Pandora’s Box.
“Neither the Congress nor the BJP could have afforded to
ignore the sizable vote bank of poorvanchalis settled or living in
Uttarakhand,” said Jay Singh Rawat, a Dehradun-based political commentator.
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