Search This Blog

Wednesday, April 22, 2020

पृथ्वी दिवस 2020 : लॉक डाउन में फिर इठलाने लगी गंगा 

tributary | National Geographic Society


लॉक डाउन में निखर रही है पतित पावनी गंगा
-जयसिंह रावत
विश्वव्यापी कोविड-19 महामारी का मुकाबला करने के लिये लागू देशव्यापी लॉक डाउन से महामारी के संक्रमण पर चाहे जितना भी असर पड़ा हो, मगर इसका सीधा असर देश के पर्यावरण और खास कर करोड़ों सनातन धर्मावलम्बियों की आस्था की प्रतीक और उत्तर भारत की जीवन दायिनी गंगा पर स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है। वन्यजीवों का हाल तो यह है कि वनों के नभचर और थलचर भी इन दिनों बस्तियों के निकट स्वच्छंद विचरण करते देखे जा रहे हैं।

गंगाजल में आशातीत सुधार

उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ताजा रिपोर्ट के अनुसार ऋषिकेश के लक्ष्मण झूला क्षेत्र में इन दिनों गंगा के पानी में फीकल कॉलिफार्म की मात्रा में 47 प्रतिशत की कमी आई है। वहीं ऋषिकेश में बैराज से आगे यह कमी 46 प्रतिशत, हरिद्वार में बिंदुघाट के पास 25 प्रतिशत और हर की पैड़ी पर 34 प्रतिशत दर्ज की गई है। इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि लॉकडाउन के दौरान हर की पैड़ी पर गंगा का पानी प्रथम श्रेणी का हो चुका है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ताजा रिपोर्ट में भी गंगाजल में सुधार के संकेत बताये गये है। बोर्ड की पिोर्ट के अनुसार रियल टाइम वॉटर मॉनिटरिंग में गंगा नदी का पानी 36 निगरानी केन्द्रों में से 27 में नहाने के लिए उपयुक्त पाया गया है। जबकि पिछले साल की रिपोर्ट में केन्द्रीय बोर्डा के अध्ययन में  86 में से 78 स्थानों पर गंगाजल पीने के लिये ही नहीं बल्कि नहाने योग्य भी नहीं पाया गया था।

उद्योग बंद होने और शवदाह रुकने से भी पड़ा असर

बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के अन्तर्गत आईआईटी के केमिकल इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर पी. के मिश्रा द्वारा हाल ही में किये गये एक अध्ययन के अनुसार लॉकडाउन के शुरू होने से लेकर अब तक गंगा के पानी में सुधार दिखाई दे रहा है। अधिकतर उद्योगों का जो प्रदूषण गंगा में मिलता है वह कारखानों के बंद होने से रुक गया है। डा0 मिश्रा के अनुसार गंगा में होने वाले कुल प्रदूषण में उद्योगों की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत होती है। यह वैल्यूमवाइज होता है। इसकी स्ट्रेन्थ 30 प्रतिशत होती है। यह बीओडी (बायोलाजिकल आक्सीजन डिमांड) ज्यादातर उद्योगों से और शेष अन्य श्रोतों से आता है। इधर लॉकडाउन से घाटों के किनारे शव जलना, नौकायान तथा अन्य गतिविधियां बंद होने से भी लगभग 5 प्रतिशत गंदगी कम हुई है। यद्यपि लॉकडाउन में भी सीवेज वाली गंदगी अभी रुक नहीं पाई है, फिर भी  इसमें घुलित ऑक्सीजन 5 से 6 प्रति लीटर एमजी से बढ़कर 8-9 हो गई है। लॉकडाउन के दौरान हर पैरामीटर में 35 से 40 प्रतिशत असर हुआ है। इस कारण गंगा निर्मल दिखाई दे रही है।

लॉकडाउन से पहले बुरा हाल था पतित पावनी का

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा गत वर्ष मई में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि गंगा का पानी पीने के लिये बिल्कुल अनुपयुक्त होने के साथ ही उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक के हिस्से में गंगाजल नहाने लायक भी नहीं है। बोर्ड के कुल 86 स्थानों पर बने गंगाजल निगरानी केन्द्रों में से केवल 7 केन्द्रों के निकट ही गंगा जल कीटाणुशोधन के बाद पीने लायक था। शेष 78 केन्द्रों के निकट का पानी पीने योग्य नहीं था। इनमें से भी केवल 18 स्थानों पर गंगाजल नहाने योग्य पाया गया था। जबकि सम्पूर्ण गंगा तट के 62 स्थानों पर पानी नहाने के लिये भी उपयुक्त नहीं पाया गया। जिन 7 स्थानों पर कीटाणुशोधन के बाद गंगाजल पीने योग्य पाया गया उनमें से अधिकतर स्थान उत्तराखण्ड में तथा 2 स्थान पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में चिन्हित किये गये। गंगा का शेष हिस्सा हिन्द महासागर में गिरने तक पीने और नहाने के योग्य नहीं पाया गया था। जिन 78 क्षेत्रों में गंगाजल पीने और स्नान के लिये उपयुक्त नहीं पाया गया उनमें से बिहार में भुसौला के पास गोमती नदी में, कानपुर, बाराणसी के गोला घाट, राय बरेली के डालमऊ, इलाहाबाद संगम, बुक्सार, पटना, भागलपुर, एवं  पश्चिम बंगाल का हावड़ा-शिवपुर आदि क्षेत्र शामिल थे।

गंगा करोड़ों रुपए खर्च करके साफ नहीं हुई जबकि लॉक डाउन से वह अब पहले से साफ दिखाई देे रही है।

उत्तराखण्ड से निर्मल बहती है गंगा

पिछले साल भी जिन 6 स्थानों पर गंगाजल कीटाणुशोधन के बाद पीने योग्य पाया गया उनमें उत्तराखण्ड में भागीरथी में गंगोत्री, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग, रायवाला और ऋषिकेश, उत्तर प्रदेश में बिजनौर और पश्चिम बंगाल में डायमण्ड हार्बर शामिल थे। इसका मतलब साफ है कि गंगा अपने मायके उत्तराखण्ड में तो निर्मल है लेकिन वह जैसे ही मैदान में अपनी लम्बी यात्रा शुरू करती है, उसमें गंदगी का बोझ बढ़ता जाता है। लेकिन ज्यादातर शोर उत्तराखण्ड में गंगा की स्थिति पर किया जाता है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश में नदियों को प्रदूषित करने वाले 1360 उद्योग चिन्हित किये हैं। इस सूची में उत्तराखण्ड के 33, उत्तरप्रदेश के 432, बिहार के 22 और पश्चिम बंगाल के 56 कारखाने शामिल हैं जो कि गंगा में सीधे खतरनाक रसायन और संयंत्रों से निकला दूषित जल तथा कचरा प्रवाहित कर रहे हैं। इनमें कानुपर के 76 चमड़ा कारखाने भी शामिल हैं।

मैदान उतरते  ही मैली होने लगती है गंगा 

गंगा की अलकनन्दा और भागीरथी जैसी श्रोत जलधाराऐं समुद्रतल से लगभग 5 हजार मीटर की ऊंचाई से उत्तराखण्ड हिमालय के लगभग 917 में से 665 (427 अललकनन्दा और 238 भागीरथी के) ग्लेशियरों की नाशिकाओं (स्नाउट्स) से अपनी लम्बी यात्रा पर निकल पड़़ती हैं। आप कल्पना कर सकते हैं कि 5 हजार मीटर की ऊंचाई से चली हुयी जलराशियां जब ऋषिकेश में 300 मीटर की ऊंचाई पर उतरती होंगी तो तीब्र ढाल के कारण गंगा का वेग कितना प्रचण्ड होगा। एक अध्ययन के अनुसार भागीरथी का ढाल 42 मीटर प्रति किमी और अलकनन्दा का ढाल 48 मीटर प्रति कि.मी. है। जिसका ढाल जितना अधिक होगा उसका वेग उतना ही अधिक होगा। गंगा की यही उछलकूद उसे स्वच्छ और निर्मल बनाती है। जलमल शोधन संयंत्रों में भी तो इसी तरह जल शोधन किया जाता है। अलकनंदा और भागीरथी के संगम देवप्रयाग से जब गंगा समुद्र मिलन के लिये यात्रा शुरू करती है तो उसका रंग मौसम के अनुसार नीला, कभी हरा तो बरसात में मटमैला होता है। गंगा को मैदानों के लिये हिमालय से उपजाऊ मिट्टी लाने की जिम्मेदारी भी निभानी हो़ती है। हरिद्वार के बाद गंगा रंग बदलने लगती है और प्रयागराज इलाहाबाद में यमुना से मिलन के बाद तो वह काली कलूटी और महानदी की जगह महानाला जैसी दिखती है।

हरिद्वार से सागर तक 800 किमी चलती है गंगा

हरिद्वार से लगभग 800 कि.मी. लम्बी मैदानी यात्रा करते हुए गढ़मुक्तेश्वर, सोरों, फर्रुखाबाद, कन्नौज, बिठूर, कानपुर होते हुए गंगा इलाहाबाद (प्रयाग) पहुँचती है जहां उसका मिलन यमुना से होता है। काशी (वाराणसी) में गंगा एक वक्र लेती है, और वहां से उत्तरवाहिनी कहलाती है। यहाँ से मिर्जापुर, पटना, भागलपुर होते हुए पाकुर पहुँचती है। इस बीच इसमें सोन, गंडक, घाघरा,कोसी आदि नदियां मिल जाती हैं। भागलपुर में राजमहल की पहाड़ियों से यह दक्षिणवर्ती होती है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के गिरिया स्थान के पास गंगा नदी दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है-भागीरथी और पद्मा। भागीरथी नदी गिरिया से दक्षिण की ओर बहने लगती है जबकि पद्मा नदी दक्षिण-पूर्व की ओर बहती फरक्का बैराज से छनते हुई बंाग्ला देश में प्रवेश करती है। मुर्शिदाबाद शहर से हुगली शहर तक गंगा का नाम भागीरथी नदी तथा हुगली शहर से मुहाने तक गंगा का नाम हुगली नदी हो जाता है। देखा जाय तो मुर्शिदाबाद से लेकर कानपुर तक गंगा के स्वास्थ्य के तत्काल इलाज की जरूरत है।


Friday, April 17, 2020

आखिर नदी में छलांग लगाने को मजबूर क्यों हैं मजदूर 





उत्तराखण्ड में लाखों मजदूर भुखमरी के कगार पर
-जयसिंह रावत
पिथौरागढ़ जिले के धारचुला में फंसे हजारों नेपाली मजदूरों में से 11 ने काली नदी में छलांग लगा दी। देहरादून के सहसपुर क्षेत्र में एक मजदूर ने क्वारेंटइन से भाग कर पत्नी समेत आत्महत्या कर ली। कई मजदूर सब्जियों और राशन के ट्रकों में छिप कर अपने घर जाने का सफल और असफल प्रयास कर रहे हैं। पहाड़ों में कंदराओं में कुछ मजदूरों के शरण लेने की भी सूचनाएं है। राज्य सरकार के हिसाब से केवल 40 हजार मजदूर राज्य में फंसे हुये हैं, लेकिन गैर सरकारी अनुमान इस इस आंकड़े को लाखों में बता रहे हैं। सरकार और समाज द्वारा मजबूर मजदूरों को भोजन आदि आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास तो किया जा रहा है मगर सरकार की मशीनरी अभी तक सुदूर क्षेत्रों तक नहीं पहुंच पायी है। इधर पहाड़ में खेती तो पहले से ही चौपट थी, लेकिन अब कमाऊ लोगों के बेरोजगार हो जाने से पहाड़वासियों के सामने भी दो जून की रोटी का सवाल खड़ा हो गया है।
मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत का कहना है कि प्रदेश में खाद्यान्न सहित अन्य आवश्यक सामग्री की भी पर्याप्त व्यवस्था की गई है। प्रदेश के 13 लाख कार्ड धारकों को 15 किलो राशन के अलावा 5 किलो प्रति यूनिट अतिरिक्त राशन उपलब्ध कराए जाने के साथ ही 3 माह का राशन अग्रिम दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने गरीबों और फंसे हुये मजदूरों के लिये बने राहत कैंपों में पर्याप्त राशन की व्यवस्था होने की बात भी कही है। लेकिन सच्चाई यह है कि शासन के पुरजोर प्रयासों और समाज के खुल कर मदद के लिये आगे जाने के बावजूद प्रदेश में फंसे मजदूरों और बेरोजगार हो चुके लोगों के समक्ष गंभीर स्थिति खड़ी हो गयी है। अगर सचमुच सब कुछ ठीकठाक रहता तो 13 अप्रैल को पिथौरागढ़ जिले के धारचुला में छारछुम और न्याबस्ती में बने राहत कैंपों से भाग कर 11 नेपाली मजदूर काली नदी में छलांग नहीं लगाते। इनमें से 7 को वहां तैनात एसएसबी के जवानों ने बचा लिया तो 4 मजदूर तैर कर नेपाल सीमा में चले गये जहां दारचुला में नेपाली प्रशासन ने उन्हें क्वारेंटाइन में डाल दिया। 13 अपैल को ही हल्द्वानी से ट्रक में छिप कर नैनीताल जा रहे मां-बेटे को पुलिस ने पकड़ लिया। मार्च में टिहरी जिले के कण्डीसौड़ में एक नेपाली मजदूर ने जंगल में फांसी लगा कर आत्महत्या कर दी। सब्जी और राशन के ट्रकों में छिप कर भागने का प्रयास करने की कई घटनाएं सामने आई हैं। टिहरी में भी अभी सेकड़ों मजदूर राहत कैम्पों से बाहर बताये गये हैं। हाल ही में सहसपुर क्षेत्र के तिपरपुर गांव का 21 वर्षीय मजदूर अशोक गांव के ही स्कूल में बने क्वारेंटाइन से गायब हो गया। बाद में अशोक और उसकी पत्नी के शव मिली के जंगल में पेड़ से लटके मिले। अशोक उन 30-40 मजदूरों में शामिल था जोकि हाल ही में लॉकडाउन घोषित होने पर पंजाब से वापस घर लौटा था और उसे अन्य मजदूरों के साथ क्वारेंटाइन में रखा गया था। अशोक तज्जों नाम की लड़की से कुछ ही महीने पहले प्रेम विवाह किया था।
अपदा प्रबंधन विभाग की अपर सचिव रिदिम अग्रवाल के अनुसार राज्य में लगभग 40 हजार मजदूर फंसे हुये हैं जिन्हें राहत कैंपों में रखा गया है। लेकिन गैर सरकारी अनुमान के अनुसार सारे प्रदेश में बाहरी प्रदेशों के लाखों मजदूर एवं रेड़ी ठेली आदि लगाने वाले फंसे हुये है। ये मजदूर चमोली के बूरा, सुतोल, रौता, सिमलासू, उत्तरकाशी के हरसिल, जानकी चट्टी, मोरी, नैटवाड़, चम्पावत के बुगा, टिहरी के गंगी जैसे सुदूरवर्ती क्षेत्रों में फंसे हुये हैं। फंसे हुये मजदूरों का कहना है कि उन्हें ठेकेदारों ने समय से पैसे नहीं दिये इसलिये वे फंस गये। इधर ठेकेदार कहते हैं कि मार्च के महीने में अगर राज्य कर्मचारियों की आरक्षण विरोधी हड़ताल को समय से निपटा दिया गया होता तो गत 31 मार्च तक विभागों से उनका भुगतान हो जाता और वे अपने मजदूरों को समय से उनका पैसा दे देते। लेकिन हड़ताल तोड़ने का प्रास बहुत देर से तब हुआ जब कोरोना की महामारी रोकने के लिये लॉकडाउन होने वाला था। कर्मचारी हड़़ताल के तत्काल बाद लॉकडाउन में सरकारी कार्यालय ही बंद हो गये। अब नये वित्तीय वर्ष में दफ्तर खुलने के बाद ही उनको भुगतान हो पायेगा और वे भी अपने मजदूरों को पैसा दे पायेंगे।
 अर्थ एवं संाख्यकी निदेशालय के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में कुल कर्मकारों का प्रतिशत कुल जनसंख्या का लगभग 27 प्रतिशत है। इस हिसाब से से कुल कर्मकारों की संख्या 27 लाख से अधिक होनी चाहिये। राज्य में 327 बड़े और लगभग 63 हजार सूक्ष्म, लघु और मध्यम दर्जे के उद्योग हैं। इन उद्योगों में लगभग सवा चार लाख लोगों को प्रत्यक्ष और लगभग 3 लाख को परोक्ष रोजगार मिलता है। श्रम विभाग से मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश में 3450 कारखाने पंजीकृत हैं जिनमें लगभग 5 लाख लोग कार्यरत् हैं। इनके अलावा सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड में लगभग 3.25 लाख मजदूर कार्यरत है। इन मजदूरों के खातों में सरकार ने अब तक 25 करोड़ रुपये डाल दिये हैं। श्रम मंत्री हरक सिंह रावत के अनुसार अभी मजदूरों को 7 करोड़ की एक और किश्त बांटी जानी है। लेकिन समस्या उन मजदूरों की है जो कहीं भी पंजीकृत नहीं हैं और ये लाखों मजदूर इन दिनों समाज तथा सरकार की ओर से उपलब्ध भोजन पर निर्भर हैं।
उत्तराखण्ड की असली समस्या पलायन एवं विभिन्न कारणों से खेती के अनुपजाऊ होने और रकवा घटना है। राज्य गठन से पूर्व नब्बे के दशक में हरिद्वार को छोड़ कर गढ़वाल और कुमाऊं में लगभग 7 लाख हेक्टेअर कृषिभूमि थी जो कि अब घट कर 4,92,643 हेक्टेअर रह गयी है। इसमें हरिद्वार जिले की खेती भी शामिल है। पहाड़ों में जो खेती बची भी है वह भी भूूअपरदन, बिखरी एवं बहुत छोटी जोत तथा वन्यजीवों के कारण ज्यादा काम की नहीं रह गयी है। ऐसी स्थिति में अगर बाहर से पहाड़ी गावों में राशन नहीं पहुंचेगा तो भुखमरी की नौबत सकती है। सरकार ने बीपीएल और एपीएल के लिये सस्ते अनाज की व्यवस्था तो की है मगर उसे खरीदने के लिये भी पैसों की जरूरत होगी। सरकारी अनुमान के अनुसार दिल्ली आदि मैदानी शहरों में रोजगार के लिये गये 18 हजार से अधिक लोग गांव लौट गये हैं और हजारों अन्य बाहर ही फंसे हुये हैं। गावों के निकट के कस्बों में होटल एवं ढाबों आदि में काम करने गये लोग भी लॉक डाउन के कारण बेरोजगार हो गये हैं। उत्तराखण्ड के लगभग सभी पहाड़ी जिले उद्योग शून्य हैं। जो उद्योग देहरादून, हरिद्वार औरउधमसिंहनगर जिलों में हैं वे इन दिनों बंद हैं और आगे भी इन उद्योगों का भविष्य अनिश्चित है। पहाड़ का सबसे बड़ा उद्योग परिवहन है जिसमें लगभग 2.50 लाख कमिशियल वाहन हैं। इन वाहनों के पहिये जाम हैं और उन पर काम करने वाले लाखों पहाड़ी युवा घरों में बेकार बैठे हुये हैं। ऐसी स्थिति में लोगों के सामने आजीविका की गंभीर समस्या खड़ी हो गयी है।
जयसिंह रावत
-11,फ्रेण्ड्स एन्कलेव, शाहनगर
डिफेंस कालोनी रोड, देहरादून।
उत्तराखण्ड।
मोबाइल-9412324999