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Tuesday, December 25, 2012

DONT RAPE CRIMINAL JUSTICE SYSTEM IN THE NAME OF CAMPAIGN AGAINST GANG RAPE


बलात्कार का इलाज मृत्युदण्ड भी नहीं
-जयसिंह रावत

दिल्ली की चलती बस में हुये सामूहिक बलात्कार काण्ड से भारतीय जनमानस केवल मर्माहत है बल्कि उसका गुस्सा सड़कों पर फूट रहा है। यह एक तरह से राष्ट्रीय शर्म की बात ही है, लेकिन समाज दिशा देने वाले राजनेता और समाज को दर्पण दिखाने वाले मीडिया के साथ ही विभिन्न तरह के सामाजिक संगठनों द्वारा जिस तरह इस मामले पर बयानबाजियां की जा रही हैं वह और भी ज्यादा चिन्ताजनक है। क्योंकि कानून भावावेश में या दबाव में नहीं बल्कि न्याय की कसौटी पर कस कर बनते हैं। मृत्युदण्ड और अंगभग या नपुन्सक बनाने की मांग मान ली गयी तो उससे समस्या का समाधान तो निकलेगा नहीं मगर क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (अपराधिक न्याय व्यवस्था) के साथ बलात्कार अवश्य हो जायेगा।
दिल्ली की ताजा शर्मनाक घटना के बाद जिस तरह से लोग सड़कों पर रहे हैं, उससे उनके गुस्से की थाह स्वतः ही ली जा सकती है। इस तरह एक जघन्य अपराध के खिलाफ समाज को खड़ा होना ही चाहिये और यही एक जीवन्त और सजग समाज की पहचान भी है। लेकिन क्या ही अच्छा होता अगर इसी तरह हमारे देश का मीडिया, हमारे पक्ष और विपक्ष के नेता, महिला आयोग समेत विभिन्न संगठन और सरोकारों के स्वयंभू ठेकेदार एन.जी. देश के अन्य हिस्सों में होने वाले इसी तरह के जघन्य अपराधों के खिलाफ भी खड़े होते और बलात्कार पड़िताओं के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित करते। वास्तव में देखा जाय तो एक ही तरह के अपराधों में दुहरा मापदण्ड अपने आप में एक नैतिक अपराध है। दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों के बलात्कारियों में फर्क करना एक तरह से स्त्रित्व की गरिमा का अपमान और मानवता के प्रति अपराध ही है। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। दिल्ली में एक बार दुर्भाग्य से संजय और गीता चोपड़ा नाम के दो भाई बहनों के साथ ही इसी तरह की दरिन्दगी हुयी। रंगा और बिल्ला नाम के दो हैवानों ने भाई को पहले मार डाला और फिर नाबालिग बच्ची से कुकर्म कर उसकी भी जीवन लाला समाप्त कर दी। ऐसे जघन्य कुकृत्य के लिये मृत्यु दण्ड स्वाभाविक ही था। बाद में केन्द्र सरकार ने इन दो बच्चों के नाम से राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार ही शुरू कर दिये। उसके बाद भी जाने कितने मासूमों के साथ इस तरह की हैवानियत हुयी होगी मगर तो केन्द्र सरकार ने उन सबके नाम से पुरस्कार शुरू किये और ना ही ऐसे संगठन सड़क पर उतरे।
दिल्ली की शर्मनाक घटना को लेकर देश के विभिन्न शहरों में जो कुछ हो रहा है उसमें अक्रोश कम और तमाशा ज्यादा नजर रहा हैं। अगर कोई अनपढ़ या नासमझ बलात्कार के मामलों में मृत्युदण्ड की मांग करे तो बात समझ में आती है। लेकिन अगर इसी तरह फांसी की मांग देश का मीडिया और स्वयं कानून बनाने वाले लोग करने लगें तो आप उसे क्या कहेंगे। कई बार तो लगता है कि इतने गम्भीर मामले में भी लोग मशखरी ही कर रहे हैं। कुछ लोग बलात्कारियों को फांसी का प्रावधान करने की वकालत कर रहे हैं तो कुछ उन्हें नपुन्सक ही बना डालने की मांग तक करने लगे हैं। कुछ विद्वान नर नारी बलात्कारियों के लिये इन्जेक्शन तैयार करने की राय दे रहे हैं तो कुछ अंगभग की वकालत भी कर रहे हैं। कुल मिला कर देखा जाय तो इतना गम्भीर मामला मजाक बनाता जा रहा हैं। अब इसी से समझा जा सकता है कि ऊंची-ऊंची हांकने वाला हमारा सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व ऐसे  मामलों में भी कितना गम्भीर है। कानून बनाने वाली देश की सर्वोच्च पंचायत संसद के एक सदन लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता ने भी बलात्कारियों को मृत्युदण्ड की वकालत की है। लेकिन वह भूल गयीं कि सन् 1999 में जब लालकृष्ण आडवाणी गृहमंत्री थे तो उन्होंने भी कानून को कठोरतम बनाने की घोषणा की थी। अगर कठोरतम् कानून ही एक समाधान होता तो यह काम सुष्मा स्वराज की अपनी पार्टी के शासनकाल में ही वह शुभ कार्य क्यों नहीं हुआ। 
बिडम्बना देखिये कि एक तरफ तो आप पकड़े गये अधिकांश बलात्कारियों को एक दिन की भी सजा नहीं दिला पा रहे हैं और बात मृत्युदण्ड की कर रहे हैं। जिन लोगों को अदालत मृत्युदण्ड देती भी है उन्हें हमारी व्यवस्था फांसी के तख्ते तक नहीं पहुंचा पा रही है। अगर इसी तरह मशखरी में मृत्युदण्ड की व्यवस्था हो गयी तो वह कानून के साथ बलात्कार ही होगा। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी) के अनुसार  देश की अदालतों में वर्ष 2010 के शुरू में 89707 बलात्कार के मामले विचाराधीन या पेण्डिंग थे। इनमें से उस साल 10,475 मामलों में आरोपी दोषमुक्त हो गये और मात्र 3,788 मामलों में बलात्कारियों को सजा हो पायी। इस प्रकार हमारी कानून व्यवस्था मात्र 26.55 प्रतिशत मामलों में सजा दे पायी और 73.44 प्रतिशत मामलों में आरोपी दोषमुक्त हो कर छूट गये। यही नहीं उस साल के अन्त में अदालतों में 75,295 मामले लम्बित पड़े थे। इस प्रकार समय से न्याय मिलने पर भी पीड़ितायें न्याय से वंचित रह गयीं, क्योंकि न्याय की ही भावना है कि (”जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड) अगर, न्याय में विलम्ब होता है तो न्यायार्थी न्याय से वंचित हो जाता है। अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार विभिन्न प्रदेशों और संघ शाषित प्रदेशांे की पुलिस के पास जनवरी 2010 में बलात्कार के कुल 33436 मामले विवेचनाधीन थे। इनमें से 1 मामला वापस हुआ तो 44 मंे पुलिस ने जांच स्वीकार नहीं की। इनके अलावा पुलिस ने 1681 बलात्कार के आरोप फर्जी पाये जबकि 18654 मामलों में ही पुलिस अदालत में बलात्कारियों पर चार्जशीट दाखिल कर सकी। साल के अन्त में पुलिस के पास 11980 मामले लम्बित पड़े थे या आरोपियों के खिलाफ पूरे सालभर तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी थी। मतलब यह कि पुलिस एक साल में मात्र 79 प्रतिशत मामलों को ही न्याय के लिये अदालत में पेश कर सकी। बलात्कार ही नहीं हमारी अपराधिक न्यायिक व्यवस्था में हत्या जैसे जघन्य मामलों में भी कानून निरीह नजर आता है। कानून के छेदों के कारण बलात्कारी ही नहीं अपितु हत्यारे भी साफ बच निकल आते हैं और दिन प्रतिदिन उनके हौसले बुलन्द होते जाते हैं। ऐसी स्थिति में बलात्कारियों को मृत्युदण्ड की मांग करना अपने आप में एक मशखरी ही है।
दुनियां में जहां मनावाधिकारों के नाम पर मृत्युदण्ड का विरोध हो रहा है वहीं भारत में हर मामले में मृत्युदण्ड की मांग उठ रही है। लगता है कि हमारा देश मध्यकालीन युग में जा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध से मृत्युदंड उन्मूलन हेतु लगातार प्रयास होते रहे हैं। सन् 1977 में, 6 देशों ने इसे निषेध किया था। वर्तमान स्थिति यह है कि 95 देशों ने मृत्युदंड निषेध कर दिया है, 9 देशों ने इसे अन्य सभी अपराधों के लिये निषेध किया है, सिवाय विशेष परिस्थितियों के, और 35 देशों ने इसे पिछले दस वर्षों में किसी को आरोपित नहीं किया है। अन्य 58 देशों ने इसे पूरी तरह लागू किया हुआ है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार, वर्ष 2009 में 18 देशों ने कम से कम 714 मृत्युदंड दिये हैं और लागू भी किये हैं। हाल ही में कसाब को तो फांसी हो गयी मगर देश में अफजल गुरू और राजवाना जैसे  अब भी 401 ऐसे कैदी हैं जिन्हें फांसी की सजा सुनाई गई है। इनमें से 10 फीसदी कैदियों ने ही राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिकाएं दायर की हैं, जिसका निपटारा नहीं हो पाया है। इन कैदियों में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या के दोषी तीन कैदी भी शामिल हैं। भारत में 1975 से 1991 के बीच कम से कम 40 लोगों को फांसी के फंदे पर लटकाया गया था। लेकिन तमिलनाडु के सलेम में 27 अप्रैल 1995 को सीरियल किलर आटो शंकर को फांसी देने के नौ साल बाद अगस्त 2004 में कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फांसी के फंदे पर लटकाया गया। उसके बाद मुम्बई आतंकी हमले के दोषी पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को फंासी पर लटकाया जा सका।
अपराध की दुनियां मे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 को 302 के मुकाबले ज्यादा खतरनाक माना जाता है। इसका कारण यह कि धारा 302 हत्या के मामले में प्रभावी होती है और उसमें पीड़ित गवाही के लिये जिन्दा नहीं रह पता है, जबकि हत्या का प्रयास वाली दफा 307 में हिंसा पीड़ित व्यक्ति गवाही के लिये स्वयं जीवित रहता है। पिछले रिकार्ड देखों तो हत्या के प्रयास के मामलों में सजा की दर हत्या के मामलों से कहीं अधिक नजर आती है। इसलिये अपराधी हत्या का प्रयास करने के बजाय हत्या करने में ही अपने को सुरक्षित मानते हैं। अगर बलात्कार के सभी मामलों में मृत्युदण्ड का प्रावधान कर दिया गया तो बलात्कारी को मृत्युदण्ड मिले या मिले मगर पीड़िता की मृत्यु तय मानी जा सकती है। ऐसे में बलात्कारी सबूत मिटाने के लिये पीड़िता के जीवन को ही मिटा देंगे।
दरअसल कानून तो सड़कों पर बनते हैं और ना ही भावनाओं में बह कर कानून बनाये जा सकते हैं। सड़क और संसद की भाषा में भी फर्क होना चाहिये। जो कानून भावावेश में बनेंगे उनसे न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती है। कानूनों को कठोर बना कर अगर समाज को अपराध मुक्त किया जा सकता तो मृत्युदण्ड के भय के कारण समाज में हत्या जैसे जघन्य अपराध ही होते। समाज में आज अगर थोड़ी बहुत कानून व्यवस्था कायम है तो उसका श्रेय हमारी सामाजिक व्यवस्था को दिया जा सकता है। आज भी लोग ईश्वर से डरते हैं या फिर लोकलाज और लोक आचरण का लिहाज करते हैं। समाज में यौन अपराध क्यों बढ़ रहे हैं, इस पर समाजशास्त्रियों और जागरूक नागरिकों को मन्थन करने की जरूरत हैं। स्त्री देह का केवल फिलमों और टेलिविजन चैनलों पर बेजा इस्तेमाल हो रहा है, बल्कि उनकी देखादेखी कर आज फैशन का नंगा नाच खुले आम देखा जा सकता है। कम से कम और भड़काऊ या बदन उघाड़ू वस्त्र धारण करना ही फैशन बन गया है। इस तरह के फैशन का आप अगर विरोध करते हैं तो आपको मध्ययुगीन सोच या विकृत सोच से ग्रसित होने की पदवी दे दी जाती हैं। 
वर्तमान बाजारीकरण ने एक तरफ स्त्री को यौन वस्तु के रूप में बदलने में पूरी ताकत लगाई है, दूसरी तरफ पुरुष की यौनेच्छा को बढ़ाने से भी ज्यादा उकसाने का काम किया है। समाज अगर सचमुच में स्त्रियों के प्रति बढ़ते बलात्कार और यौन हिंसा से चिंतित है, तो उसे स्त्री को यौन वस्तु के रूप में दिखाने वाली हर एक चीज का विरोध करना पड़ेगा। गौर से देखने पर पाएंगे कि पूरे माहौल मेंसेक्सश्घुला हुआ है। अखबार, पत्रिकाओं और टीवी में आने वाले विज्ञापन फिल्में, अश्लील गाने, साहित्य, समचार,फोटो, फिल्मी संवाद, इंटरनेट हर जगह स्त्री को सबसेसेक्सीरूप में परोसा जा रहा है। अब तो अगर किसी लड़की को अच्छा कम्पलीमेण्ट देना है तो उसे सेक्सी कहा जा रहा है। इस वर्ष इंटरनेट पर सबसे ज्यादा पूनम पांडे औरजिस्म“- 2 की हीरोइन सनी लिओन को लोगों ने सबसे ज्यादा हिट ढूंढा है। सनी लियोन की पोर्न छवि को भुना कर अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिये एक चैनल उसे अपने एक कार्यक्रम में ले आया था। ऐसी परिस्थितियों में अगर आप कानून से बलात्कार रोकने की सोच रहे हैं तो भूल कर रहे हैं।

-जयसिंह रावत-
-11 फ्रेंड्स एन्क्लेव , शाहनगर,
डिफेंस कालोनी रोड,
देहरादून
उत्तराखण्ड।
मोबाइल- 09412324999
jaysinghrawat@gmail.com

Friday, November 2, 2012

NORTH ORIENTATION OF UTTARAKHAND GOVERNMENT




गैरसैंण में सरकारी उत्तरायणी मेला
-जयसिंह रावत
लखनऊ से आ कर देहरादून में अटकी हुयी सरकार पहली बार सीमान्त जिला चमोली के दूरस्थ क्षेत्र गैरसैण तक तो पहुंच गयी है मगर जब उसकी सोच दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रस्थान नहीं करती तब तक शायद ही इस तरह के सरकारी उत्तरायणी मेलों का कोई ज्यादा लाभ हो सकेगा। वास्तव में सरकार सुदूर पहाड़ी इलाकों में भौतिक रूप से पहुंचे या नहीं मगर उसकी सोच उत्तरोन्मुखी होनी चाहिये। राष्ट्रहित में सामरिक दृष्टि से संवेदनशील इस क्षेत्र से हो रहे जनसंख्या पलायन को रोकने के लिये भी केन्द्र और राज्य सरकारों का पहाड़ोन्मुखी होना जरूरी है।
देशभर में मकर संक्रंाति के अवसर पर सामान्यतः जनवरी में मनाया जाने वाला उत्तरायणी पर्व उत्तराखण्ड की बहुगुणा सरकार ने गैरसैण में कैबिनेट बैठक कर 2 महीने पहले ही मना लिया है। गैरसैंण की कैबिनेट बैठक भले ही प्रदेश के मंत्रियों और नौकरशाहों के लिये महज एक सैर सपाटा हो मगर दशकों से सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं का इन्तजार कर रहे पहाड़वासियों के लिये यह महज ’एक दिनी तमाशा’ नहीं बल्कि अपनी वेदनाओं की अभिव्यक्ति का एक बेहतरीन मौका है। कैबिनेट के निर्णयों का भविष्य क्या होगा, यह तो समय ही बतायेगा मगर इस बैठक से उम्मीद की जा रही है कि अब राज्य की सरकारें दक्षिणायन से पलट कर उत्तरायण की ओर पहाड़ोन्मुखी होंगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसका खामियाजा न केवल उत्तराखण्ड के पहाड़ बल्कि समूचे राष्ट्र को उठाना पडे़गा। पहाड़ों से और खास कर सीमान्त और दुर्गम क्षेत्रों से जिस तेजी से आबादी का पलायन हो रहा है, उससे देश की सुरक्षा व्यवस्था ही खतरे में पड़ सकती है। भारत-तिब्बत सीमा से लगी नीलंग और नीती माणा से लेकर ब्यांस तथा जोहार घाटियों तक सभी गांव बहुत तेजी से खाली होते जा रहे हैं, जबकि देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी और नैनीताल जैसे नगरों पर जनसंख्या का बोझ असह्य होता जा रहा है।
गैरसैण बैठक के लिये मंत्रियों और अफसरों की सुख सुविधाओं के लिये जिस तरह धन बहाया गया वह भले ही फंूक झोपड़ी और देख तमाशा की कहावत को चरितार्थ कर गया। इसके लिये भाजपा सहित विभिन्न विरोधी पक्षों का मुखर होना भी स्वाभाविक ही था। लेकिन बावजूद इसके यह बैठक उत्तराखण्ड की एक नाजुक रग पर हाथ रख गयी है। यह सही है राजधानी वो बला है जो कि एक बार अंगद की तरह पैर जमा दे तो उसे फिर मोहम्द तुगलक जैसे पागल बादशाह ही दिल्ली से तुगलकाबाद खिसका सकते हैं। उत्तराखण्ड की राजधानी ने भी देहरादून में पांव जमा ही दिये हैं और उसे गैरसैंण ले जाने वाला तुगलक अब शायद ही पैदा हो। इसी सच्चाई को ध्यान में रखते हुये अब तक की भाजपा और कांग्रेस सरकारें देहरादून में ही राजभवन, मुख्यमंत्री आवास, सचिवालय और विधानसभा सहित तमाम जरूरी भवन और सुविधायें जमा चुकी हैं। राजधानियां एक जगह से दूसरी जगह खिसकाना इतना आसान होता तो हिमाचल की राजधानी कबके शिमला से पालमपुर आ जाती और हरियाणा के लोग दूसरा चण्डीगढ़ बसा देते। वास्तविकता यह है कि राजधानी के लिये एक नया शहर बसाना आसान नहीं है। जो सरकारें बसे बसाये देहरादून का मास्टर प्लान तक नहीं बना पा रही हैं उनसे इतना बड़ा शहर बसाने की उम्मीद रखना ही फिजूल है। केन्द्र सरकार अगर मदद देने वाली होती तो उत्तराखण्ड से पहले हरियाणा को अपनी अलग राजधानी मिलती। लेकिन बावजूद यह भी सच्चाई है कि गैरसैंण न केवल पहाड़ी की जनभावनाआंे और अभिलाषाओं का प्रतीक है अपितु गढ़वाल और कुमायूं का केन्द्र बिन्दु भी है। अगर इस सुदूर पहाड़ी इलाके में सरकार आ कर बैठ रही है तो उसे पूरी तरह ”फ्लाप शो“ या ”नाटक“ घाषित करना उचित नहीं है।
कई दशकों के संघर्ष के बाद भारत-तिबबत और नेपाल से लगे इस पहाड़ी क्षेत्र के लिये सरकार लखनऊ से देहरादून तो आ गयी मगर देहरादून से उत्तराखडियों की सरकार बारह सालों में ही पहाड़ चढ़ने में हांपने लगी है। इस सरकार के विकास की गाड़ी का पहाड़ चढ़ते समय इंजन ही फेल हो गया है। आज एक बार फिर पहाड़वासियों को अपनी ही सरकार को उत्तराखण्ड आन्दोलन का स्मरण कराना पड़ रहा है। उस आन्दोलन के पीछे मात्र तीन कारण थे जिनमें से पहला भौगोलिक दूसरा आर्थिक और तीसरा सांस्कृतिक पहचान का था। इनमें से भौगोलिक कारण का अगर समाधान कर दिया होता तो मंत्रियों और नौकरशाहों को जहाज में उड़ कर गैरसैंण नहीं जाना पड़ता। लोगों के लिये आज भी अस्पताल, स्कूल, पीने का पानी और अन्य जरूरी सुविधाऐं इतनी दूर न होती। प्रदेश के कई गावों के लिये पानी 5 किमी से दूर है। इसी तरह 244 गावों के लिये प्राइमरी स्कूल, 2384 गांवों केलिये मिडिल या सीनियर बेसिक स्कूल, 9869 गांवों के लिये बालिका हाइस्कूल, 8671 के लिये प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र या ऐलोपैथिक अस्पताल, 1994 के लिये मोटर मार्ग या मुख्य सड़क और 3213 गांवों के लिये डाकघर की दूरी 5 किमी से अधिक है।
उत्तराखण्ड राज्य की मांग के पीछे आर्थिक पक्ष भी एक प्रमुख कारण था। यह कारण अब भी ज्यों का त्यों न होता तो इस तरह सेकड़ों गांव जनसंख्या विहीन नहीं हो जाते और पौड़ी तथा अल्मोड़ा की जनसंख्या बढ़ने के बजाय घटती नहीं जाती। राज्य गठन के समय प्रदेश की राजधानी देहरादून का जनसंख्या घनत्व 415 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. था जो कि 2011 में 550 हो गया। इसी तरह हरिद्वार का जनसंख्या घनत्व 613 व्यक्ति से 817 और उधमसिंहनगर जिले का 486 से 648 व्यक्ति प्रति कि.मी हो गया। जबकि उत्तरकाशी का जनसंख्या घनत्व 41,चमोली का 49 और पिथौरागढ़ का घनत्व 69 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी तक ही पहंुच पाया। जनगणना के आंकणों पर गौर करें तो सन् 1991 और 2001 के बीच उत्तराखण्ड के 45 गांव और 2001 से लेकर 2011 तक 32 गांव जनसंख्या विहीन हो गये। यही नहीं हजारों पहाड़ी गांवों की आबादी आधी रह गयी। हालात इस कदर नाजुक हो गये हैं कि गांव में शव को शमशान ले जाने के लिये 4 युवा कन्धे जुटाना मुश्किल हो गया है। नाबार्ड के स्टेट फोकस पेपर 2010-2011 के अनुसार सरकारों की लापरवाही के कारण विकास की दौड़ में मैदानी जिलों की अपेक्षा पहाड़ी जिले बहुत पीछे हैं। पहाड़ी जिलों में पक्की सड़कों की औसत लम्बाई मात्र 318-78 किमी प्रति हजार वर्ग किमी है तो मैदान में यही अनुपात दोगुने से भी ज्यादा 799 किमी है। पहाड़ी जिलों में जहाँ लगभग 78 प्रतिशत लोगों को पीने के पानी के लिये घरों से बाहर निकलना पड़ता है। वहाँ मैदान में यह सिर्फ 30 प्रतिशत है। पहाड़ी क्षेत्र में जहाँ 50 प्रतिशत घरों में बिजली है वहीं मैदानी जिलों में 70 प्रतिशत घरों में बिजली है। इसमें चिंताजनक बात यह है कि पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में विकास की यह खाई लगातार बढ़ रही है।

उत्तराखण्ड की हालत आज यह हो गयी कि पहाड़ के मंत्रियों को गैरसैंण जाने के लिये हवाई जाहज की जरूरत पड़ रही है।  नयी राजनीतिक जमीन के लिये हरीश रावत अल्मोड़ा से हरिद्वार आ गये। पूर्व मुख्यमंत्रियों में से भुवनचन्द्र खण्डूड़ी धूमाकोट से कोटद्वार और रमेश पोखरियाल निशंक थलीसैण से देहरादून के डोइवाला में आ गये। डोइवाला पर कांग्रेस के मंत्री हरक सिंह रावत ने पहले ही ताल ठोक दी थी। इसी तरह नैनीताल और हल्द्वानी तथा उनके निकट की सीटों पर पहाड़ी नेता आ कर जम गये हैं।

उत्तराखण्ड आन्दोलन में नारे लगाने के लिये भले ही आज कुछ लोग पंेशन आदि के रूप में भाड़ा मांग रहे हैं। लेकिन तीन दर्जन से अधिक ऐसे आन्दोलनकारी भी रहे जिन्होंने अलग राज्य के लिये अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिये तथा हजारों अन्य ने पुलिस के लाठी डण्डे खाये और लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे।यह उन्माद पहाड़वासियों का अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिये ही था। पहाड़वासिों की अपनी संस्कृति पलायन के कारण देहरादून, हल्द्वानी और हरिद्वार जैसे शहरों की गलियों में भटक कर विकृत हो गयी है। पहाड़ के लोगों को अपनी संस्कृति देहरादून में नहीं बल्कि गैरसैंण में सुरक्षित नजर आती है। देहरादून में धन्ना सेठों और चकड़ैतों के हाथों न केवल सत्ता बल्कि संस्कृति भी बन्धक हो गयी है।

-- जयसिंह रावत--
ई- 11 फं्रेण्ड्स एन्क्लेव, शाहनगर,
डिफेंस कालोनीए देहरादून।
मोबाइल- 9412324999
फोन-2665384