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Wednesday, December 7, 2016

RETIRED BUT NOT TIRED TO EXPLOIT UTTARAKHAND

आपदा पीड़ितों से अधिक नौकरशाहों के पुनर्वास की चिन्ता
-जयसिंह रावत
देहरादून। उत्तराखण्ड में आपदा पीड़ितों या सीमाओं पर देश के लिये सर्वोच्च बलिदान देने के लिये तत्पर रहने वाले सैनिकों का  पुनर्वास हो या हो मगर जीवनभर हाकिमों की तरह प्रजा पर हुक्म चलाने वाले जनसेवकों का रिटायरमेंट से पहले ही पुनर्वास अवश्य हो जाता है। लोकसेवा और सूचना का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण आयोगों में जनता पर हुक्म चलाने वाले ये जनसेवक अपनी कुर्सी पहले ही पक्की कर देते हैं।
 उत्तराखण्ड के वर्तमान मुख्य सचिव शत्रुघ्न सिंह अभी रिटायर भी नहीं हुये और उनके लिये राज्य सरकार ने पहले ही मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी परोस दी। उन्हें दिसम्बर में रिटायर होना हैं और उनकी मुख्य सूचना आयुक्त पद पर नियुक्ति पर 31 दिसम्बर को ही राजभवन की मुहर लग गयी। इसी प्रकार अक्टूबर सन् 2005 में रिटायर होने से कुछ दिन पहले तत्कालीन मुख्य सचिव रघुनन्दन सिंह टोलिया ने नये-नये खुले राज्य सूचना आयोग में अपने लिये मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी सुरक्षित करा ली थी। उत्तराखण्ड और खासकर पहाड़ के इस स्वयंभू हितैषी नौकरशाह ने आइएएस बिरादरी के पुनर्वास की परम्परा की जो बीमारी शुरू की वह केवल अब तक जारी है अपितु यह संक्रामक बीमारी अन्य सेवाओं में भी शुरू हो गयी है। उसके बाद तो मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिटायर्ड चीफ सेक्रेटरी के लिये सुरक्षित होने के साथ ही राज्य लोक सेवा आयोग जैसे अन्य आयोगों और प्रमुख संस्थाओं का मुखिया पद रिटायर्ड आइएएस अधिकारियों के लिये आरक्षित हो गये।़ सूचना आयोग में अब रिटायर्ड टोलिया के बाद नृपसिंह नपलच्याल 2010 में मुख्य सूचना आयुक्त बने और उसके बाद सुभाष कुमार को राज्य विद्युत नियामक आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया तो एन. रविशंकर को अगला मुख्य सूचना आयुक्त बनाने की तैयारी शुरू हो गयी। आपदा घोटाले में तत्कालीन राजनीतिक शासकों को क्लीन चिट देने के कारण प्रतिपक्ष के नेता अजय भट्ट के ऐतराज के कारण रवि शंकर की नियुक्ति तो नहीं हो पायी मगर उनके लिये जल आयोग अवश्य बन गया। शत्रुघ्न सिंह के रिटायरमेंट से एक महीना पहले ही उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त के तौर पर पुनर्वासित कर दिया गया।
राज्य में अजय विक्रम सिंह और मधुकर गुप्ता के बाद लगभग सभी मुख्य सचिवों को राज्य में कहीं कही पुनर्नियुक्त किया जाता रहा है। मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी खाली होने पर एस.के. दास को राज्य लोकसेवा अयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। जबकि इससे पहले इस पद पर राज्य के निवासी एक सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल जी.एस नेगी नियुक्त किये गये थे। लोकसेवा अयोग का अध्यक्ष पद ही नहीं बल्कि सदस्य पद भी उसके बाद रिटायर्ड आइएएस और पीसीएस के लिये अघोषित आरक्षित हो गये। मुख्य सचिव पद के लिये सूचना तथा लोकसेवा अयोग में पद खाली होने पर अगले मुख्य सचिव सुभाष कुमार को राज्य विद्युत नियामक आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। सुभाष कुमार के बाद एन रविशंकर रिटायर हुये तो राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त बनने में नेता प्रतिपक्ष ने रोड़े के कारण उनके लिये राज्य जल आयोग बना दिया गया। राज्य लोक सेवा आयोग के अलावा रिटायर नौकरशाहों के पुनर्वास के लिये अधीनस्थ सेवा आयोग भी बनाया गया। उसके अध्यक्ष पद अतिरिक्त मुख्य सचिव रहे एस. राजू को अध्यक्ष बना दिया गया। उनसे पहले उस पद पर भारतीय वन सेवा के डा0 रघुवीर सिंह रावत को अध्यक्ष बनाया गया था। जब सुभाष कुमार गये तो उनकी जगह जोड़तोड़ के बाद बहुचर्चित आइएएस राकेश शर्मा को बिठाया गया। राकेश शर्मा के 30 अक्ूबर 2015 को रिटायर होने से पहले ही उन्हें सेवा विस्तार देने का निर्णय राज्य सरकार ने ले लिये लेकिन केन्द्र सरकार तक शर्मा की ख्याति पहुंची हुयी थी इसलिये राज्य सरकार द्वारा पूरी ताकत झौंक देने के बाद भी मोदी सरकार ने क्लीन चिट नहीं दी। मजबूरन राज्य सरकार को इसहुनरमंदअधिकारी की असाधारण सेवाएं लेने के लिये उन्हें 15 नवम्बर 2015 को मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव पद पर बिठाना पड़ा।
इस अफसर के लिये राज्य सरकार को असाधारण ढंग से व्यवस्था करनी पड़ी। बाद में उन्हें राजस्व परिषद का अध्यक्ष भी बना दिया गया। जबकि यह पद आइएएस संवर्ग के लिये नहीं था। यह बात दीगर है कि वर्तमान राजनीतिक शासक अब राकेश शर्मा पर की गयी मेहरबानियों के लिये माथा पीट रहे हैं। सुना गया है कि वह अब कांग्रेस के बजाय भाजपा से किच्छा सीट पर टिकट का जुगाड़ कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस की सरकार ने उन्हें मुख्यमंत्री के बाद दूसरा सत्ता का केन्द्र बना दिया था।
मुख्य सचिव ही नहीं बल्कि राज्य सरकार अन्य आइएएस अधिकारियों को भी पुनर्वासित करने के लिये उन्हें सेवा का विस्तार या अन्य जगहों पर एडजस्ट करती रही है। सन् 2012 में राज्य सरकार ने डीके कोटिया को दो बार सेवा का विस्तार दिया जबकि वह 30 सितम्बर 2012 को रिटायर हो गये थे। उन्हें मार्च 2013 तक प्रमुख सचिव पद पर सेवा का अवसर मिला। आइएएस सुरेन्द्र सिंह रावत जब 30 जून 2013 को रिटायर हुये तो उन्हें जुलाइ 2013 तक सेवा विस्तार दे दिया गया और बाद में उन्हें पाच साल के लिये राज्य सूचना आयुक्त  बना दिया गया। सुवर्द्धन 30 जून 2013 को रिटायर हो रहे थे लेकिन उन्हें सितम्बर तक के लिये सेवा विस्तार देने के बाद राज्य निर्वाचन आयुक्त का संवैधानिक पद दे दिया गया। आइएएस रमेश चन्द्र पाठक भी 30 जून 2013 को सेवा निवृत्त हो रहे थे और उन्हें भी सितम्बर 2013 तक सेवा विस्तार दे दिया गया। अतिरिक्त मुख्य सचिव पद पर रहे एस.के.मट्टू 31 सितम्बर को रिटायर हो गये थे। उन्हें 1 अगस्त 2013 से अगले छह मोह तक के लिये एक्सटेंशन दे दिया गया। सीएमएस बिष्ट 30 सितम्बर 2014 को रिटायर हो रहे थे और उन्हें दिसम्बर 2014 तक सेवा विस्तार देने के बाद लोकसेवा आयोग का सदस्य भी बना दिया गया। एस. राजू 31 मार्च 2016 को रिटायर हो गये। उन्हें भी मुख्य सूचना आयुक्त के पद का लालच मिला था लेकिन परिस्थितियां अनुकूल होने के कारण उन्हें अधीस्थ सेवा आयेग का अध्यक्ष बना दिया गया। पीएस जंगपांगी 13 जनवरी 2016 को रिटायर हो गये थे। उन्हें 2 वर्ष के लिये राजस्व परिषद का न्यायिक सदस्य बना दिया गया। एक निगम के आला अधिकारी को नोटों के बंडल लेते सारी दुनिया ने देखा और सरकार ने उसे तीसरी बार सेवा विस्तार दे दिया।


Jay Singh Rawat
jaysinghrawat@gmail.com
09412324999




Thursday, November 17, 2016

उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी पर  असमंजस क्यों
-जयसिंह रावत
उत्तराखंड की स्थाई राजधानी का सवाल प्रदेश के दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों के लिये वह गर्म दूध हो गया जो कि तो निगले जा रहा है और ना ही उगलते बन रहा है। प्रदेश में सत्ताधारी कांग्रेस गैरसैण के मुद्दे को चर्चा के केन्द्र में तो ले आई मगर वह उसे क्या नाम दे, इस पर अटक गयी है। इसी तरह प्रमुख विपक्षी दल भाजपा गैरसैण में फिजूलखर्ची का रोना तो रो रही है मगर वह भी वहां तो राजधानी की जैसी सुविधाऐं जुटाने का विरोध कर पा रही है और ना ही उसे स्थाई या ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाने की हिम्मत जुटा पा रही है।
भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने 18 मई 2015 को उत्तराखंड विधानसभा में अपने ऐतिहासिक भाषण में गैरसैण को प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाये जाने की बात कह चुके हैं। लेकिन उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार है कि राष्ट्रपति द्वारा कही गयी बात को भी दुहराने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। जबकि चमोली गढ़वाल के गैरसैण में विधानसभा का लगातार दूसरा सत्र आयोजित हो रहा और गैरसैण के ही निकट भराड़ीसैंण में राजधानी का जैसा ढांचा शक्ल लेता जा रहा है। दो सत्र गैरसैण में चलने के बाद तीसरा सत्र भराड़ीसैण स्थित नवनिर्मित विधानभवन में भी आहूत हो गया। वहां विधानभवन ही नहीं बल्कि विधायक आवास भी तैयार हो चुके हैं और मिनी सचिवालय का ढांचा भी लगभग तैयार ही है।
लेकिन जब गैरसैंण को राजधानी या ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाये जाने की बात आती है तो मुख्यमंत्री यह तो कह देते हैं कि उनकी सरकार उसी दिशा की ओर बढ़ रही है। मगर वे यह घोषणा करने से साफ बच निकलते हैं कि गैरसैण ही वास्तव में भविष्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। इसी तरह सत्ता की प्रबल दावेदार भाजपा गैरसैण में राजधानी की जैसी सुविधाएं जुटाने का तो समर्थन कर पा रही है और ना ही वह विरोध की स्थिति में है। भाजपा एक तरफ तो प्रस्ताव आने पर समर्थन की बात करती है, क्योंकि उसे पता है कि कांग्रेस सरकार में इतना बड़ा कदम उठाने की हिम्मत नहीं है। दूसरी तरफ भाजपा वहां विधानसभा सत्र आहूत करने का फिजूलखर्ची का आरोप भी लगा रही है। गैरसैण में आहूत पिछले दोनों सत्रों भाजपा सदस्य जिस तरह आपा खो बैठे उससे गैरसैण के बारे में उनकी अरुचि का खुलासा हो गया।
दरअसल गैरसैंण के मामले में कांग्रेस सरकार और खासकर हरीश रावत ने कुछ हिम्मत तो जरूर जुटाई है, मगर भविष्य की राजधानी के बारे में छाये हुये कोहरे को हटाने की हिम्मत वह भी नहीं जुटा पाये। कांग्रेस सरकार के संकोच का एक कारण यह भी हो सकता है कि गैरसैण को स्थाई राजधानी घोषित करना तो इतना आसान है और ना ही इतना व्यवहारिक। ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा करने का मतलब है वहां स्थाई राजधानी की मांग को सीधे-सीधे नकार देना।
वैसे भी राजधानी के चयन के लिये गठित दीक्षित आयोग ने तो 2 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी उसमें गैरसैण को सीधे सीधे ही रिजेक्ट कर दिया था। दीक्षित आयोग ने गैरसैण के साथ ही रामनगर तथा आइडीपीएल ऋषिकेश को द्वितीय चरण के अध्ययन के दौरान ही विचारण से बाहर कर दिया था और उसके बाद आयोग का ध्यान केवल देहरादून और काशीपुर पर केन्द्रित हो गया था। हालांकि दीक्षित आयोग ने गैरसैण के विपक्ष में और देहरादून के समर्थन में जो तर्क दिये थे वे कुतर्क ही थे। जैसे कि उसने गैरसैण का भूकंपीय जोन में और देहरादून को सुरक्षित जोन में बताने के साथ ही गैरसैंण में पेयजल का संभावित संकट बताया था। आयोग का यह अवैज्ञानिक तर्क किसी के गले नहीं उतरा था। आयोग ने मानकों की वरीयता के आधार पर गैरसैंण को केवल 5 नम्बर और देहरादून को 18 नंबर दिये थे। यही नहीं आयोग ने देहरादून के नथुवावाला-बालावाला स्थल के पक्ष में 21 तथ्य और विपक्ष में केवल दो तथ्य बताये थे, जबकि गैरसैण के पक्ष में 4 और विपक्ष में 17 तथ्य गिनाये गये थे। फिर भी आयोग ने जनमत को गैरसैण के पक्ष में और देहरादून के विपक्ष में बताया था। वास्तव में पहाड़ों से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के कारण प्रदेश का राजनीतिक संतुलन जिस तरह गड़बड़ा़ रहा है उसे देखते हुये प्रदेश की सत्ता के प्रमुख दावेदार कांग्रेस और भाजपा भी खुलकर गैरसैण के समर्थन में आने से कतरा रहे हैं। वैसे भी जब राजधानी अंगद की तरह कहीं पैर रख देती है तो उसे उखाड़ना लगभग नामुमकिन ही हो जाता है।
सन् 1856 में ब्रिटिश कमिश्नर लुशिंगटन ने गैरसैण के लोहबा में पेशकारी दफ्तर बनाया  था, जिसमंे नायब तहसीलदार को रखा गया। उन्होंने इसे सबसे बेहतरीन स्थान बताते हुए प्रशासन का केंद्र बनाने का प्रस्ताव भी प्रांतीय सरकार को भेजा था तथा सिल्कोट टी स्टेट और अन्य चाय बागानों को मिलकर चाय बगान का मुख्यालय भी बनाया था। भराडी़सैण के पास ही रीठिया चाय बागान के पास 100 हैक्टेअर, सिलकोट के पास 300 हैक्टेअर और बेनीताल चाय बागान के पास 350 हैक्टेअर जमीन पड़ी है। इन बागानों के मालिक गैरसैंण में राजधानी जाने की प्रतीक्षा में हैं ताकि इन विशाल बागानों पर शानदार रिसार्ट बनाये जा सकें। प्रख्यात समाजसेवी स्वर्गीय स्वामी मन्मथन और कम्युनिस्ट नेता विजय रावत तथा मदनमोहन पाण्डे इन चाय बागानों के अधिग्रहण के लिये 1978 आन्दोलन भी चला चुके हैं।
सन् 2002 में जब उत्तराखंड विधानसभा का पहला चुनाव हुआ था तो उस समय 40 सीटें पहाड़ से और 30 सीटें मैदान से थीं। इसलिये सत्ता का संतुलन पहाड़ के पक्ष में होने के कारण पहाड़ी जनभावनाओं के अनुरूप गैरसैण को भी देहरादून से अधिक जनमत हासिल था। यह जनमत उसी दौरान आयोग द्वारा एकत्र किया गया था। सन् 2006 में हुये परिसीमन के तहत पहाड़ की 40 सीटों में से 6 सीटें जनसंख्या घटने के कारण घट गयीं और मैदान की 30 सीटें बढ़ कर 36 हो गयीं। जबकि पहाड़ में 10 जिले हैं और मैदान में देहरादून समेत केवल 3 ही जिले हैं और इन तीन जिलों में ही उत्तराखण्ड की राजनीतिक ताकत सिमटती जा रही है। अगर यही हाल रहा तो सन् 2026 के परिसीमन में पहाड़ में 27 और मैदान में 43 सीटें हो जायेंगी। पहाड़ से वोटर ही नहीं बल्कि नेता भी पलायन कर रहे हैं। राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव लड़ने मैदान में गये हैं। यकीनन मैदानी वोटरों के रूठने के डर से भी प्रमुख दलों के राजनीतिक नेता खुलकर गैरसैण की तरफदारी करने से कतरा रहे हैं।
गैरसैंण केवल पहाड़ के लोगों की भावनाओं का प्रतीक नहीं बल्कि इस पहाड़ी राज्य की उम्मीदों का द्योतक भी है। गैरसैण के भराड़ीसैंण में अघोषित ग्रीष्मकालीन राजधानी का आधारभूत ढांचा खड़ा किये जाने की शुरूआत के साथ ही वहां एक नये पहाड़ी नगर की आधारशिला भी पड़़ गयी है। वह नवजात शहर स्वतः ही देहरादून के बाद सत्ता का दूसरा केन्द्र बन जायेगा। सत्ता के इस वैकल्पिक केन्द्र में स्वतः ही नामी स्कूल और बड़े अस्पताल आदि जनसंख्या को आकर्षित करने वाले प्रतिष्ठान जुटने लग जायेंगे। अगर पहाड़ी नगर शिमला और मसूरी में देश के नामी स्कूल खुल सकते हैं तो फिर गैरसैंण में क्यों नहीं। सत्ता ऐसी मोहिनी है कि निवेशक खुद ही गैरसैंण की ओर खिंच आयेंगे। लोगों का मानना है कि गैरसैण में ग्रीष्मकालीन राजधानी बनने से प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति में बदलाव आयेगा और उसमें पहाड़ीपन झलकने लगेगा। पहाड़ का जो धन मैदान की ओर रहा है वह वहीं स्थानीय आर्थिकी का हिस्सा बनेगा। प्रदेश के हर कोने से जब गैरसैण जुड़ेगा तो इन संपर्क मार्गों पर छोटे-छोटे कस्बे उगेंगे और उससे नया अर्थतंत्र विकसित होगा।

-जयसिंह रावत
पत्रकार
-11  फ्रेंड्स एन्क्लेव, शाहनगर,
डिफेंस कालोनी रोड, देहरादून।
मोबाइल 09412324999
jaysinghrawat@gmail.com