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Saturday, July 5, 2014

GAIRSAIN A DREAM CAPITAL OF UTTARAKHAND

गैरसैंण सपनों की राजधानी
-जयसिंह रावत
गढ़वाल और कुमाऊं के ठीक मध्य में पहाड़ों की गोद में बसे गैरसैण में इन दिनों टेंटों के अन्दर उग रही राजधानी की रौनकों को देख कर लगता है कि अब गैरसैण गैर नहीं रह गया है। कभी अकेला उत्तराखण्ड क्रांतिदल जब गैरसैण का राग अलापता था तो वह बेसुरा राग एक फसाना लगता था] लकिन अब वहां जो परिस्थितियां बन रही हैं उन्हें देख कर वह फसाना हकीकत सा लगने लगा है। अब बात इतनी आगे बढ़ गयी कि किसी के लिये भी कदम पीछे खींचना आसान नहीं रह गया है।
गैरसैण में विधानसभा भवन बनाने की घोषणा के साथ ही वहां कैबिनेट की बैठक तक करने वाले विजय बहुगुणा ने गैरसैण को प्रदेश  की ग्रीश्मकालीन राजधानी बनाने की घोषणा न करने की चूक की थी उससे वह इतिहास पुरुश बनते-बनते रह गये। लेकिन लगता है कि विजय बहुगुणा की उस चूक से जो ऐतिहासिक श्रेय छूट गया था उसे हरीश  रावत ने लपक लिया। विपक्षी भाजपा भी जिस तरह अपने ही बाल नोच कर ईश्र्या भरी प्रतिक्रिया कर रही है उसे देख कर भी लगता है कि हरीश  रावत शयद बाजी मारने जा रहे हैं। राजनीतिक तौर पर भी समझदारी इसी में है कि भाजपा अब इस बारे में एक कदम और आगे बढ़ कर बात करे। बकौल हरीष रावत अब हर साल विधानसभा का ग्रीश्मकालीन सत्र गैरसैण में ही होगा और कोई भी सरकार इससे पीछे नहीं हट पायेगी। इसके लिये सभवतः गैरसैण में ही विधिवत घोशणा भी हो जायेगी। जब कांग्रेस की सरकार यह सब कर रही है और विपक्षी भाजपा भी इसे ग्रीश्मकालीन राजधानी बनाने की बात कर रही है तो फिर इस गैर रहे गैरसैंण को सत्ता का दूसरा केन्द्र बनने से अब कौन रोक सकता है? वास्तव में अब लोग गैरसैण या भराड़ीसैण से उत्तराखण्ड के भाग्य की लकीरें खिंचवाना चाहते हैं।
टेंटों में हर बार राजधानी या विधानसभा नहीं चलती है। गैरसैण में विधानभवन निर्माण की टेंडर प्रक्रिया चल रही है। कोई भी राजधानी अकेले विधानभवन से नहीं चल सकती। इसलिये वहां पूरा मिनी राजधानी का ढांचा खड़ा हो रहा है और इसके लिये मुख्यमंत्री ने बाकायदा एक विकास प्राधिकरण ही गठित कर दिया है जो कि अल्मोड़ा और चमोली जिलों के इस बीच के हिस्से में नगर विकास का कार्य करेगा। सरकार इसके लिये 50 करोड़ की घोषणा भी कर चुकी है।
गैरसैण में अगर ग्रीश्मकालीन राजधानी के रूप में विकसित होता है तो इस पहाड़ी राज्य में निष्चितरूप से एक “ाानदार पहाड़ी शहर का उदय हो जायेगा। विधानसभा सत्र चाहे एक दिन ही क्यों न चले मगर उसके लिये पूरा तामझाम गैरसैण में लाना ही होगा और उसके बाद वह नवजात शहर स्वतः ही देहरादून के बाद सत्ता का दूसरा केन्द्र बन जायेगा। मुख्यमंत्री वैसे भी घोषणा कर चुके हैं कि गैरसैंण में कई विभागों के कार्यालय भी खुलेंगे। सत्ता के इस वैकल्पिक केन्द्र में स्वतः ही नामी स्कूल और बड़े अस्पताल आदि जनसंख्या को आकर्शित करने वाले संस्थान जुटने लग जायेंगे। पहाड़ों से fशक्षा और चिकित्सा के लिये सबसे अधिक पलायन हो रहा है। बीस सालों में कम से कम 100 गांव निर्जन हो गये हैं और हजारों गांवों की आबादी आधी रह गयी है। अगर पहाड़ी नगर fशमला और मसूरी में देश  के नामी स्कूल खुल सकते हैं तो फिर गैरसैंण में क्यों नहीं। सत्ता ऐसी मोहिनी है कि निवेषक खुद ही गैरसैंण की ओर खिंच आयेंगे। निवेषक पहुंचेगे तो रोजगार भी बढ़ेगा और पहाड़ियों को रोजगार की तलाष में मैदानी “ाहरों में नहीं भटकना पड़ेगा। चूंकि जनसंख्या के भारी दबाव के कारण नैनीताल और मसूरी की कैरीइंग कैपैसिटी (धारक क्षमता) समाप्त हो चुकी है, जिस कारण इन पर्यटन नगरों का आकर्शण भी नाममात्र का ही रह गया है। अब अगर पूरे 187 साल बाद पहाड़ों में एक और हिल स्टेश न बनता है तो निसंदेह वह मसूरी और नैनीताल की जैसी बूढ़ी पर्वत रानियों की तरह नहीं बल्कि एक आधुनिका की तरह ही होगी, जिसकी टाउन प्लानिंग अगले सौ वर्शों का ध्यान में रख कर की जायेगी जो कि बड़े पैमाने पर पर्यटकों को आकर्शित करेगी। लेकिन इसके साथ ही जरूरी है कि वहां के स्थानीय लोगों की जमीनों की रक्षा की जाय। ऐसा न हो कि कल गैरसैण के भूमिहीन हो चुके लोग अपनी ही धरती पर सड़कों पर ठेली लगाने और दफ्तरों के चैकीदार चपरासी बनने को मजबूर न हो जांय। चहां के चाय बागानों पर नजर रखे जाने की जरूरत है।
देष की सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुये रेल मंत्रालय सीमान्त जिला चमोली में ही कर्णप्रयाग तक रेल लाइन बिछाने की तैयारियों में जुटा हुआ है। सामरिक दृश्टि से भी रेल लाइन को बद्रीनाथ तक जाना ही है। कर्णप्रयाग और गैरसैंण के बीच बहुत कम फासला है। जाहिर है कि तीर्थयात्रियों और अन्य आगन्तुको का बहुत बड़ा रेला गैरसैण के निकट कर्णप्रयाग तक पहुंचेगा तो वह कस्बा भी बड़ा  शहर बन जायेगा। यही नहीं ऋशिेकेष से लेकर कर्णप्रयाग और बाद में सीधे बद्रीनाथ तक छोटे बड़े रेलवे स्टेश नों की एक श्रृंखला बन जायेगी। वैसे भी उत्तराखण्ड के चारों धामों के यात्रा मार्ग पर आज जो नगर दिखाई दे रहे हैं वे मोटर मार्ग बनने से पहले की चट्टियां ही हैं। मौजूदा सरकार ने उत्तरायण की ओर प्रस्थान तो किया मगर अभी उसकी सोच को उत्तरोन्मुखी होना बाकी है। हालांकि गैरसैंण में विधानभवन की घोषणा और अब वहां विधानसभा सत्र को आहूत करना उत्तरोन्मुखी सोच का ही संकेत है। राश्ट्रहित में सामरिक दृश्टि से संवेदनशh ल इस क्षेत्र से हो रहे जनसंख्या पलायन को रोकने के लिये भी केन्द्र और राज्य सरकारों का पहाड़ोन्मुखी होना जरूरी है। पहाड़ों से और खास कर सीमान्त और दुर्गम क्षेत्रों से जिस तेजी से आबादी का पलायन हो रहा है, उससे देश  की सुरक्षा व्यवस्था ही खतरे में पड़ सकती है। भारत-तिब्बत सीमा से लगी नीलंग और नीती माणा से लेकर ब्यांस तथा जोहार घाटियों तक सभी गांव बहुत तेजी से खाली होते जा रहे हैं] जबकि देहरादून] हरिद्वार] हल्द्वानी और नैनीताल जैसे नगरों पर जनसंख्या का बोझ असह्य होता जा रहा है।
नाबार्ड के स्टेट फोकस पेपर 2010-2011 के अनुसार सरकारों की लापरवाही के कारण विकास की दौड़ में मैदानी जिलों की अपेक्षा पहाड़ी जिले बहुत पीछे हैं। पहाड़ी जिलों में पक्की सड़कों की औसत लम्बाई मात्र 318-78 किमी प्रति हजार वर्ग किमी है तो मैदान में यही अनुपात दोगुने से भी ज्यादा 799 किमी है। पहाड़ी जिलों में जहाँ लगभग 78 प्रतिशत लोगों को पीने के पानी के लिये घरों से बाहर निकलना पड़ता है। वहाँ मैदान में यह सिर्फ 30 प्रतिशत है। पहाड़ी क्षेत्र में जहाँ 50 प्रतिशत घरों में बिजली है वहीं मैदानी जिलों में 70 प्रतिशत घरों में बिजली है। इसमें चिंताजनक बात यह है कि पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में विकास की यह खाई लगातार बढ़ रही है। पहाड़वासिों की अपनी संस्कृति पलायन के कारण देहरादून] हल्द्वानी और हरिद्वार जैसे शहरों की गलियों में भटक कर विकृत हो गयी है। पहाड़ के लोगों को अपनी संस्कृति देहरादून में नहीं बल्कि गैरसैंण में सुरक्षित नजर आती है। देहरादून में धन्ना सेठों और चकड़ैतों के हाथों न केवल सत्ता बल्कि संस्कृति भी बन्धक हो गयी है।
अब तक की भाजपा और कांग्रेस की सरकारें देहरादून में ही राजभवन] मुख्यमंत्री आवास] सचिवालय और विधानसभा सहित तमाम जरूरी भवन और सुविधायें जमा चुकी हैं। राजधानियां एक जगह से दूसरी जगह खिसकाना इतना आसान होता तो हिमाचल की राजधानी कबके fशमला से पालमपुर आ जाती और हरियाणा के लोग दूसरा चण्डीगढ़ बसा देते। लेकिन बावजूद यह भी सच्चाई है कि गैरसैंण को ग्रीश्मकालीन राजधानी बनाने में कोई हर्ज नहीं है और मुख्यमंत्री हरीष रावत बिना बोले ही इस बारे में घुमा फिरा कर मौन घोशणा कर चुके हैं।
उत्तराखण्ड आन्दोलन के पीछे जो प्रमुख तीन कारण थे उनमें पहला भौगोलिक दूसरा आर्थिक और तीसरा सांस्कृतिक पहचान का था। इनमें से भौगोलिक कारण का अगर समाधान कर दिया गया होता तो मंत्रियों और नौकरषाहों को जहाज में उड़ कर गैरसैंण नहीं जाना पड़ता। लोगों के लिये आज भी अस्पताल] स्कूल, पीने का पानी और अन्य जरूरी सुविधाऐं इतनी दूर न होती। प्रदेश  के कई गावों के लिये पानी 5 किमी से दूर है। इसी तरह 244 गावों के लिये प्राइमरी स्कूल, 2384 गांवों के लिये मिडिल या सीनियर बेसिक स्कूल] 9869 गांवों के लिये बालिका हाइस्कूल, 8671 के लिये प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र या ऐलोपैथिक अस्पताल] 1994 के लिये मोटर मार्ग या मुख्य सड़क और 3213 गांवों के लिये डाकघर की दूरी 5 किमी से अधिक है।
कुछ लोग गैरसैंण को सत्ता का दूसरा केन्द्र बनाने के मामले को तुगलकी योजना मान रहे हैं। कुछ इसे सत्ताधारियों का राजनीतिक फितूर मान रहे हैं। गैरसैण का नाम आते ही प्रदेश  को पहाड़ और मैदान में बांटने का प्रयास भी किया जा रहा है। इनका मनना है कि गैरसैण एक दिन तुगलकाबाद साबित हो जायेगा। दरअसल इस तरह की भावनाओं के पीछे सत्ता के पहाड़वासियों के करीब जाने की ई’श्र्या और घर की राजधानी के दूर जाने की आशaका का भय है। इस तरह की सोच रखने वाले भूल रहे हैं कि उत्तराखण्ड एक पहाड़ी राज्य है और इसकी विषेश भौगोलिक परिस्थिति तथा विषेश संास्कृतिक पहचान को ध्यान में रखते हुये ही इसे उत्तर प्रदेश  से अलग कर नया राज्य बनाया गया था। गैरसैण विरोधी इस सच्चाई को नजरंदाज कर रहे हैं कि लखनऊ से चली सत्ता देहरादून में अटक गयी है। अगर हरीश  रावत उस अटकी हुयी सत्ता को उसके गंतव्य पहाड़ पर चढ़ाना चाहते हैं तो इसमें बुराई क्या है\
नोट - मूल लेख के फाँट को कन्वर्ट करने में वर्तनी सम्बन्धी अशुद्धियाँ  रह  गयी हैं 
-- जयसिंह रावत--
ई- 11 फ्रेंड्स एन्क्लेव] शाहनगर 
डिफेंस कालोनी रोड] देहरादून।
मोबाइल- 9412324999
jaysinghrawat@gmail.com




Sunday, April 13, 2014

ISSUES THOSE SUBMERGED INTO A CUP OF TEA OF MODI

चाय के प्याले में डूबा आपदा का मुद्दा

- जयसिंह रावत-
कितनी हैरानी की बात है कि इस देश में एक आदमी की चाय और उसकी पत्नी पक्ष और विपक्ष के लिये चुनावी मुद्दे तो बन सकते हैं, मगर लाखों लोगों के जीवन पर मंडराता दैवीय आपदाओं का खतरा अनसुना रह जाता है। यही नहीं चुनावी मुद्दे उनकी गंभीरता के आधार पर नहीं बल्कि वोट वैल्यू और मिलने वाली सीटों की संख्या के आधार पर तय किये जाते हैं।
अगर आप इन दिनों मचे चुनावी शोर शराबे को गौर से सुनें तो आप भी भूल जायेंगे कि पिछले ही साल उत्तराखण्ड में अकल्पनीय दैवी आपदा आई थी। जबकि केदारघाटी में हजारों लोगों की चीत्कारें आज भी लोगों के कान के परदों से दूर नहीं जा हो पा रही हैं। उत्तराखण्ड ही क्यों? इस चुनावी शोर में लोग बिहार में कोसी नदी की बाढ़ को भूल गये और मोदी की चाय की खुमारी में गुजरात के लोग भुज की भूकम्प की विभीषिका को ही हजम कर गये। इतने विशाल देश में जहां एक साथ लोग सूखा और बाढ़ की विभीषिकाओं को झेलते हैं वहां पर दैवीय आपदा कोई मुद्दा ही नहीं है। हर साल मरने वाले हजारों आम लोगों की कोई गिनती नहीं है। अगर आप अपनी गिनती चाहते हैं या राजनीतिक ऐजेंडों में अपना स्थान चाहते हैं तो आपको हिन्दू या मुसलमान या अन्य धार्मिक और जातीय समुदाय के तौर पर स्वयं को राजनीतिक रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराना पड़ेगा। आपका भारतवासी होना काफी नहीं है।
जून का महीना करीब आ रहा है। पिछले साल 16 और 17 जून की याद कर उत्तराखण्ड में लोगों की रूह कांपने लगती है। ज्यों-ज्यों जून का महीना करीब आ रहा है, लोगों का मन विचलित होता जा रहा है। लोग आशंकित हैं कि न जाने इस बार किस इलाके में आसमान कहर बरपा दे। पिछले साल जो हुआ सो तो सारी दुनिया ने देख लिया। मगर उत्तराखण्ड में ऐसी कोई बरसात याद नहीं आती है, जबकि यहां सौ से अधिक लोग दैवीय आपदा में काल के ग्रास न बनें हों। पिछले साल तो वो हो गया जिसकी कल्पना कभी नहीं की गयी थी। किसी ने कभी नहीं सोचा था कि केदारनाथ में बाढ़ आ जायेगी। चौराबाड़ी ताल और ग्लेशियर पर बादल फटने की बात आज भी विज्ञानियों को पूरी तरह हजम नहीं हुयी है। क्योंकि हिमालय पर ऊंचाई बढ़ने के साथ ही वर्षा कम होती जाती है। समुद्रतल से लगभग 5 हजार मीटर की ऊचांई पर स्थित स्थाई हिम रेखा तो वर्षा के लिये वो लक्ष्मण रेखा है जिसे पार करना उसके लिये वर्जित है।  पिछले अनुभवों को देख कर सवाल उठ रहा है कि अगर पिछले साल 15 दिन पहले मानसून आ कर इतनी तबाही कर सकता है तो इस साल या आने वाले सालों में उसके समय से पहले न आने की क्या गांरटी है? अगर पिछले साल मानसून हिमालय पर हिमरेखा से ऊपर चढ़ गया तो इस बार या अगले साल क्यों नहीं चढ़ सकता है? इन माम आशंकाओं पर गौर करने के बजाय राजनीतिक जमात मोदी की चाय के प्याले के तूफान के भंवर में फंसे हुये हैं।

निश्चित रूप से देश के सामने एक से बढ़ कर एक चुनौतियां हैं और उत्तराखण्ड या कोई अन्य हिमालयी राज्य इन राष्ट्रीय चुनौतियों से अलग नहीं है। लेकिन जब जान ही आफत में हो तो आदमी सबसे पहले अपनी जान बचाने की ही सोचता है। उत्तराखण्ड के लोग जानना चाहते हैं कि आखिर राजनीतिक दलों के पास ऐसी कौन सी सोच है जिसके तहत वे इन पहाड़ों का जीवन सुरक्षित और कष्ट रहित सुनिश्चित कर सकें। केवल एक चोराबाड़ी ताल ने केदारघाटी पर कहर बरपा दिया। उत्तराखण्ड में सतोपन्थ, डोडीताल, मासरताल जैसी लगभग 40 झीलें और सरोवर हैं। इतिहास के पन्ने पलटें तो मालूम पड़ता है कि 1803 में अलकनंदा की बाढ़ से श्रीनगर गढ़वाल में काफी जन-धन की हानि हुई। 1868 में बिरही नदी में जिंजी गांव भीषण बाढ़ से तबाह हो गया। 1880 में चमोली, लालसांग में बाढ़ से दो पुल और करीब 70 यात्री बह गए। 1893 में अलकनंदा की सहायक नदी बिरही के पास गौणा गांव के किनारे पहाड़ी टूटने से 300 मीटर उंची और पांच किलोमीटर लम्बी झील बनी थी जो एक साल बाद टूटी। 1930 में बद्रीनाथ में ग्लेशियर टूटने से बनी झील के टूटने के कारण भीषण बाढ़ आई। 1970 में अलकनंदा की सहायक नदी बिरही में प्रलयंकारी बाढ़ से कई बाजार और बस्तियां तबाह हो गए। 1998 में उखीमठ के पास मनसूना में मंदाकिनी में एक किलोमीटर की झील बनी थी। नैनीताल में 18 सितंबर 1880 को हुये भूस्खलन में 151 लोगों की जानें चलीं गयीं थी। सन् 1998 की मालपा खसदी को लोग अभी तक नहीं भूले जिसमें प्रख्यात नृत्यांगना प्रोतिमा बेदी समेत लगभग 250 लोग मारे गये थे। उसी साल केदारघाटी के मनसूना में भूस्खलन से 68 लोग मारे गये थे। सन! 1978 में उत्तरकाशी में कनोडिया गाड़ में भूस्खलन से 25 लोग मारे गये थे। केदारघाटी में तो हर साल आपदा आ रही है।
सवाल केवल बाढ़ का नहीं है। उत्तराखण्ड भूकंपीय जोखिम की दृष्टि से सबसे संवेदनशील जोन 5 और जोन 4 में स्थित है। हिमालय के इस हिस्से में पांच बड़े भ्रंश या दरारें हैं। इसका सबसे अधिक हलचल माचाने वाला भ्रंश एमसीटी या मुख्य केन्द्रीय भं्रश ठीक इसके मध्य से वार-पार होता है। यहां नब्बे के दशक में उत्तरकाशी और चमोली के विनाशकारी भूचाल आ चुके हैं जिनमें लगभग 9 सौ से अधिक लोग अपने ही घरों में जिन्दा दब गये थे। भूगर्ववेत्ता कहते हैं कि ये भूचाल तो बहुत ही छोटे थे। उनका मानना है कि पिछले सौ सालों से अधिक अवधि से इस हिमालयी क्षेत्र में कोई बड़ा भूचाल न आने से भूगर्वीय उर्जा का काफी अधिक संचय धरती के नीचे हो रखा है जो कि कभी भी बहुत बड़े भूकंप के रूप में फट कर बाहर निकल सकती है। विज्ञानियों का यह भी कहना है कि अगर इतना बड़ा भूचाल आ गया तो इस इलाके में कोई भी इमारत खड़ी नहीं रह सकती, और सारा जग जानता है कि आदमी को भूचाल नहीं बल्कि अपनी आश्रय के लिये बनाया गया घर ही उसे दबा कर मार डालता है। देहरादून और हरिद्वार जैसे नगरों में अत्यधिक जनसंख्या घनत्व वाले कई ऐसे इलाके हैं जहां कई दिनों तक रेस्क्यू वर्कर नहीं पहुंच सकते हैं।
भूकंप की दृष्टि से जापान सबसे संवेदनशील माना जाता है। वहां आपदा प्रबन्धन की व्यवस्था इतनी कारगर है कि जितने बड़े भूकंप आते हैं उतनी जनहानि नहीं होती। पिछले ही साल वहां जिस तरह सुनामी ने कहर ढाया अगर वह नौबत भारत में आती तो लाखों लोग मारे जाते। लकिन जापान में ऐसा कुछ नहीं हुआ और आज लगता है कि जैसे कुछ हुआ ही नहो। ऐसी व्यवस्था भारत में इसलिये नहीं होती क्योंकि यहां मोदी की चाय का महत्व तो है मगर लोगों की जानोमाल का नहीं। सवाल केवल रेस्क्यू या त्वरित बचाव का ही नहीं बल्कि पुनर्वाास का भी है। गत वर्ष की हिमालयी सुनामी की तबाही के बाद उम्मीद जगी थी कि जो कस्बे और गांव तबाह हो गये उनकी जगह नये आधुनिक गांव और सुरक्षित कस्बे उभर कर सामने आयेंगे। ऐसा लग रहा था कि अब उत्तराखण्ड का नक्शा ही बदल जायेगा। राज्य सरकार ने विश्व बैंक की पहल पर कई संवेदनशील गावों का भूगर्वीय सर्वे भी कराया था। उनकी जगह नये क्लस्टर गांव स्थापित करने की घोषणा भी की गयी थी। कहा गया था कि पहाड़ों में ही पुराने गावों के पास आधुनिक सुविधाओं से युक्त इन गावों के अस्तित्व में आने के बाद मैदान की ओर पलायन भी रुक जायेगा। यह भी उम्मीद की जा रही थी कि अब पहाड़ों में नये कस्बों और नये गावों के साथ ही नयी सड़कें बनेंगी और पर्यटन के नये आकर्षण विकसित होंगे। लेकिन सरकार की घोषणाएं धरातल पर नहीं उतर सकीं। भाजपा के नरेद्र मोदी ने 15 दिसम्बर 2013 को देहरादून के परेड मैदान में अपनी शंखनाद रैली में बड़ी-बड़ी बातें की थी, मगर वह प्रधानमंत्री बनने से पहले ही वायदे भूल गये।
उत्तरखण्ड देश का एक सीमान्त प्रदेश है। इससे लगी हुयी लगभग 600 किमी लम्बी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा के पार चीन तथा नेपाल देश हैं। रोगजगार, शिक्षा और चिकित्सा के लिये अब तक पहाड़ों से मैदानों के लिये जनसंख्या का पलायन होता था। इसलिये पौड़ी एवं अल्मोड़ा जैसे जिलों की जनसंख्या बढ़ने के बजाय घट गयी। लेकिन अब हर साल आपदा के कारण लोग जान बचाने के लिये भी पहाड़ों से पलायन कर रहे हैं। भारत-तिब्बत सीमा पर स्थित ज्यादातर गांव तेजी से खाली हो रहे हैं। पिछले साल आयी जल प्रलय के बाद कई महीनों तक सीमान्त सड़कें बन्द रहीं। इसलिये उत्तराखण्ड में आपदा और पलायन जैसे मुद्दे केवल उत्तराखण्ड की समस्याएं न हो कर सारे देश की समस्याएं हैं। वैसे भी पिछले साल केदारनाथ सहित विभिन्न स्थानों पर मारे गये हजारों लोगों में ज्यादातर लोग देश के अन्य प्रान्तों के ही थे। लेकिन राजनीतिक दलों के ऐजेंडों में इन मुद्दों का नम्बर तब तो आयेगा जबकि मोदी के प्याले का तूफान थम जायेगा।

- जयसिंह रावत
ई-11 फ्रेंड्स एन्क्लेव, शाहनगर,
डिफेंस कालोनी रोड, देहरादून।
मोबाइल- 09412324999